कुछ लोग हमेशा ऐसी भाव-भंगिमा बनाए रखते हैं कि पता ही नहीं चलता कब गुस्से में हैं और कब नॉर्मल. आमतौर पर ऐसे लोगों को पसंद करने वाले लोग कम होते हैं बशर्ते वो बॉस, अमीर या बहुत ज्यादा ताकतवर न हो. इनका गंभीर चेहरा देखकर लगता है कि पता नहीं हमेशा कितना तनाव या घमंड में रहते हैं. मन में सवाल आता है कि ये लोग अपने घरों में कैसे पेश आते होंगे. सच कहूं तो लगता है कि इनकी जिंदगी खत्म है. अमित शाह भी इसी भाव-भंगिमा वाली बिरादरी के नजर आते हैं. हालांकि वो बॉस, अमीर और ताकतवर होने के साथ साथ एक मजबूत विचारधारा से भी जुड़े हुए हैं. उनके हाव-भावों को देखकर लगता है कि उनके आस-पास वाले उन्हें पसंद करने पर मजबूर होते होंगे. मीडिया से मिलने वाले प्यार के बावजूद वो अक्सर जिस बेदर्दी के साथ पत्रकारों से रूबरू होते हैं, उसे देखकर लगता नहीं कि उनके चाटुकारों का जीवन भी आसान होगा. हालांकि विचारधारा और अपनी रणनीतिक-भाषाई आक्रामकता की वजह से वो अपने से दूर बैठे न जाने कितने लोगों को अपना मुरीद बना चुके हैं.

अटल स्मृति स्थल से अमित शाह की कुछ तस्वीरें वायरल हुई हैं. शॉल ओढ़कर एकदम गंभीर मुद्रा में बैठे हैं. संसद में भी वो ऐसे ही नजर आते हैं. किसी की बात ज्यादा अच्छी लगती है तो गंभीरता में ही या बहुत ज्यादा किया तो मुस्कुराते हुए टेबल थपथपा देते हैं. बात नागवार गुजरने पर उनका रिएक्शन कैसा होता है ये तो कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी से शायद ही कोई बेहतर बता पाए. चुनाव जीतते हैं या कोई बिल पास करवाते हैं तो बड़े ही औपचारिक अंदाज में मोदी जी को जीत की बधाई देते हैं या बीजेपी हेडक्वार्टर में उनका स्वागत करते हैं. उस पूरे घटनाक्रम के दौरान भी वो वैसी ही संतुलित मुस्कान के साथ नजर आते हैं.

पीएम मोदी का अंदाज उनके मित्र से एकदम अलग है. वो हर मौके के मुताबिक अपनी भाव भंगिमा बदल लेते हैं. शायद इसीलिए विरोधी उन्हें एक अच्छा एक्टर भी कहते हैं. हालांकि मोदी जी के साथ इतने दिनों तक लगातार रहने के बावजूद अमित शाह का अपना ही अंदाज है. वो विरोधियों से संवाद भी सिर्फ हमला करने के लिए ही स्थापित करते हैं या उसे पार्टी में शामिल कराने के लिए. संसद से लेकर किसी भी औपचारिक मौके पर अमित शाह विपक्ष के नेताओं के साथ कोई बातचीत करते नजर नहीं आते. राजनीति के अजातशत्रु कहे जाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर अरुण जेटली और नितिन गडकरी तक को विरोधियों के साथ अपने बेहतर संबंधों के लिए जाना जाता है लेकिन दिल्ली की सियासत में लगभग 6 साल से सक्रिय होने के बाद भी अमित शाह अभी भी सभी औपचारिकताओं से दूर हैं और संसद और उसके बाहर सफल भी होते जा रहे हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी जहां 23 दलों के साथ सरकार चलाते थे. वो राज्यों में क्षेत्रीय दलों पर निर्भर थे. ममता बनर्जी की टीएमसी से लेकर फारुक अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस तक उनके गठबंधन में शामिल थीं. अमित शाह ने इस राजनीति को पलट दिया. ऐसा नहीं है कि उन्होंने गठबंधन नहीं किया. बीजेपी ने पीडीपी के साथ तक गठबंधन किया लेकिन उस गठबंधन के बाद पीडीपी का क्या परिणाम हुआ और कश्मीर में जो बदलाव हुए वो सब बीजेपी के मुताबिक थे. उनमें कहीं भी विपक्षियों की नहीं चली.

अमित शाह खुद की पार्टी को खड़ा करने पर भरोसा रखते हैं. पूर्वोत्तर से लेकर कश्मीर तक में उन्होंने सरकार बनाई. जिस बंगाल में बीजेपी शून्य पर थी आज वहां वो ममता बनर्जी की सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धी नजर आ रही है. ममता के सारे हमले अब उसी पर हैं. इस राजनीति में एक रिस्क भी है. जब आप असफल होते हैं तो बहुत सारे सवाल खड़े होते हैं. सीधे आपके नेतृत्व क्षमता पर उंगलियां उठती हैं, लेकिन सफल होने पर आपके एजेंडे पूरे हो जाते हैं. खुद के पैरों पर खड़ा होने की इसी सियासत की वजह से आज बीजेपी अपने वो एजेंडे भी पूरे कर पा रही है जिनको लेकर उस पर सवाल खड़े होते हैं. 370 खत्म हो चुका है. तीन तलाक खत्म हो चुका है. सवर्णों को आरक्षण भी सरकार दे चुकी है. नागरिकता कानून भी लागू हो चुका है. राम मंदिर बनाने का आदेश जरूर सुप्रीम कोर्ट से हुआ है और शायद उसमें भी गड़बड़ होने पर बीजेपी उसका रास्ता संसद से साफ कर देती. आने वाले वक्त में यूनिफॉर्म सिविल कोड और एनआरसी भी देश में लागू हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं होगी. मोदी- शाह की जोड़ी की इसी सियासत ने लोगों को बीजेपी को गंभीरता से लेने पर मजबूर कर दिया है. आज लोग कहते हैं कि ये सरकार कुछ भी कर सकती है.

बीते दिनों एक मित्र ने कहा कि सरकार बदलते ही अमित शाह जेल जाएंगे. राजनीति में कुछ कहा नहीं जा सकता. कुछ भी संभव है लेकिन अमित शाह अपनी शुरुआती राजनीति में ही वो दिन देख चुके हैं जो चिदंबरम जैसे नेता अब देख रहे हैं. अपनी पार्टी में उनके सामने विपक्ष नाम का कोई पक्ष नहीं है. जो है भी वो एक दम हाशिए पर है. विपक्षी पार्टियों पर तो उन्होंने शिकंजा कस ही रखा है. ससंद में जिस तरह से वो दहाड़ते हैं, उसी तरह संसद के बाहर भी विरोधियों का चैन छीन लेते हैं. विरोधियों के ठिकानों पर पड़ने वाले ईडी के छापों, कानूनी कार्रवाईयों और कई नेताओं को जेल भेजकर अमित शाह एकदम निडर होकर कदम उठा रहे हैं. मेरे मित्र की तरह बहुत से लोगों का मानना होगा कि सरकार बदलने पर अमित शाह जेल जाएंगे. लेकिन फिलहाल उनके चेहरे की भाव भंगिमा और उनके कदमों को देखकर नहीं लगता कि उन्हें वक्त से डर लगता है. वो हर एक परिस्थिति से निपट चुके इंसान नजर आते हैं जिसे कल की कोई फिक्र नहीं है और आज शायद फिक्र सिर्फ उनके विरोधियों को होनी चाहिए.