23 मई को चुनाव जीतने के बाद से कल 5 अगस्त के बीच के छोटे से समय में देश में बहुत कुछ हो गया. कहते भी हैं कि राजनीति में वक्त की कोई परिभाषा नहीं है. 23 मई से लेकर 5 अगस्त का वक्त भी राजनीति के हिसाब से बहुत लंबा है. जब नरेंद्र मोदी दोबारा पीएम बने तो चर्चा इस बात की हुई कि क्या अमित शाह गृहमंत्री बनेंगे. जल्द ही इस पर मुहर लग गई और अमित शाह कैबिनेट में शामिल हो गए. वो गृहमंत्री बने. कुछ ही दिनों बाद संसद बजट सत्र शुरु हुआ. वैसे तो बजट सत्र देश के वित्त मंत्री के नाम होता है लेकिन ये बजट सत्र पूरी तरह गृहमंत्री अमित शाह के नाम हो गया है.

कल राज्यसभा में जो हुआ उसके बाद अमित शाह का दर्जा अब अलग ही हो गया है. उन्होंने संसद को जानकारी दी कि कैबिनेट ने जम्मू कश्मीर का स्पेशल दर्जा यानि अनुच्छेद 370 खत्म करने पर मुहर लगा दी है. इस पर राष्ट्रपति ने भी हस्ताक्षर कर दिए हैं. इसके साथ ही जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन का प्रस्ताव भी पास हो गया. जम्मू कश्मीर अब दो राज्यों में बंट गया. इसका पूर्ण पर राज्य का दर्जा भी छीन लिया गया. अब जम्मू कश्मीर और लद्दाख दो राज्य होंगे जो केंद्र शासित प्रदेश होंगे. इस पूरे घटनाक्रम की तैयारी कई दिनों से चल रही थी. जम्मू कश्मीर में 38 हजार सुरक्षाबल भेजे गए थे. पहले से ही अमरनाथ यात्रा के लिए वहां सुरक्षाबल थे. अमरनाथ यात्रा भी बंद की गई. जम्मू कश्मीर हाई अलर्ट पर था. इस बड़े फैसले के लिए ताकत होनी चाहिए. संसद के बाहर और अंदर दोनों जगह समर्थन होना चाहिए और इसके साथ फैसला लेने की इच्छाशक्ति भी होनी चाहिए. इच्छाशक्ति की बात करें तो पीएम मोदी दो बार पाकिस्तान पर हमले करके दिखा चुके थे. इस बार नंबर 370 का था और उन्होंने इसे भी कर दिखाया लेकिन इस फैसले में अमित शाह काल रोल बहुत ज्यादा दिखता है. लगातार वो बैठक कर रहे थे. जम्मू कश्मीर के हालात की जानकारी ले रहे थे और साथ ही 370 खत्म करने की भी तैयारी कर रहे थे.

जम्मू कश्मीर में सुरक्षा बल बढ़ाने से लेकर वहां के मुख्यधारा के राजनैतिक दलों के नेताओं को नजरबंद करने का फैसला आसान नहीं था. इतने बड़े फैसले की प्रतिक्रिया भी होना तय थी. ये प्रतिक्रिया हिंसा में न बदले और कोई अनहोनी न हो इसकी जिम्मेदारी लेना बड़ी बात है. गृहमंत्री के तौर पर अमित शाह ने इस जिम्मेदारी को बेहतर तरीके से निभाया है. ये सही है कि शाह के ऊपर अभी नरेंद्र मोदी का हाथ है और उनके पास समर्थन है लेकिन फिर भी अमित शाह जिस पद पर हैं वहां विपक्षी दलों से लेकर अपनी पार्टी तक में दबाव का सामना करना पड़ता है. अमित शाह ने उस दबाव को सफलता पूर्वक झेला है. इससे पहले भी वो संसद में यूएपीए और एनआईए बिल पर चर्चा के दौरान पूरी तैयारी से उतरे. अपनी बात जोरदार तरीके से रखी. सवालों के जवाब दिए और फिर संख्याबल के गणित का जुगाड़ लगाना भी कोई उनसे सीखे. उन्होंने हर बाधा को आराम से पार किया.

मोदी सरकार के इस फैसले के बाद चर्चा हो रही है कि 2024 का चुनाव भी बीजेपी आसानी से जीत लेगी और विपक्ष को 2029 की तैयारी करनी चाहिए. अनुच्छेद 370 खत्म करने के पीछे कहीं न कहीं पूरे देश की भावनाएं जुड़ी थीं. अमित शाह ने लोगों के सपने को पूरा किया है. इस बात की चर्चा होती रही है कि नरेंद्र मोदी के राजनीति से जाने के बाद शायद बीजेपी के पास कोई चेहरा न रह जाए लेकिन अमित शाह ने गृहमंत्री के तौर पर जो कम समय में ही अपनी छवि बना ली है उससे लगता है कि मोदी के बाद शायद अमित शाह ही बीजेपी का चेहरा बन जाएं. देश के गृहमंत्रियों का ये मजाक उड़ाया जाता रहा है कि वो प्रधानमंत्री नहीं बन पाए लेकिन अमित शाह ने जो छवि बनाई है उसे देखकर लगता है कि वो इस धारणा को तोड़ पाने में कामयाब होंगे.