आने वाले 23 मई को ये भी साफ हो जाएगा कि भारत की सत्ता अबकी बार किसे मिलेगी. क्या पीएम मोदी पर देश ने फिर से भरोसा जताया है या जैसा राहुल गांधी कहते हैं अबकी बार गठबंधन सत्ता संभालेगा. इसी बीच चुनावी पंडित भी नतीजों से पहले गणित निकालने में जुटे हुए हैं. चूंकि यूपी सबसे ज्यादा सीटों पर वाला राज्य है इसलिए ये अहम है और हम आज आपके सामने इसी राज्य से जुड़ा एक विश्लेषण पेश करने वाले हैं.

ये विश्लेषण कानपुर के सेंटर ऑफ सोसायटी और पॉलिटिक्स के निदेशक एके वर्मा ने वेबसाइट द प्रिंट में लिखा है. इन्होंने 2014 के वोट प्रतिशत और एसपी बीएसपी के सामने बीजेपी की संभावनाओं पर लेख लिखा है. डॉक्टर वर्मा लिखते हैं कि गठबंधन वोटों के ट्रांसफर के आधार पर बना था. एक आम भावना एसपी बीएसपी में थी कि दोनों एक दूसरे के कोर वोटर ट्रांसफर कर पाएंगे. ये जाहिर है कि अखिलेश यादव की एसपी के पास जहां यादवों का कोर वोट है वहीं मायावती के पास दलितों का कोर वोट माना जाता है. डॉक्टर लिखते हैं कि ये कहना आसान था लेकिन एक दूसरे के लिए पूरा 100 फीसदी वोट ट्रांसफर हो पाना मुश्किल है और ये बीजेपी की राहें मजबूत करता है.

अगर 2014 की बात करें तो एसपी को 22.2 फीसदी वोट मिले थे जबकि मायावती की बीएसपी को 19.6 फीसदी वोट मिले थे. अगर दोनों का कुल वोट प्रतिशत जोड़ दें तो 41.8 फीसदी वोट दोनों पार्टियों को मिलाकर मिला था. अगर बीजेपी की बात करें तो उन्हें 42.3 फीसदी वोट मिले थे जबकि अपना दल को 1 फीसदी वोट मिला था.इस तरह 2014 में NDA को 43.3 फीसदी वोट मिला था. इस तरह NDA को 1.5 फीसदी वोट का फायदा मिला था.

अब बात समाजवादी पार्टी की करते हैं. अखिलेश यादव को वोट ट्रांसफर न करवा पाने के लिए अब तक जाना जाता रहा है. 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में एसपी और कांग्रेस का गठबंधन हुआ था और चुनाव में ये दिखा था कि एसपी का वोट कांग्रेस को नहीं मिला. कांग्रेस इस चुनाव में 114 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और उसे महज 7 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. अगर वोट प्रतिशत की बात करें तो कांग्रेस को 6.25 फीसदी वोट मिला था.

2014 के चुनाव एसपी को सभी कोर वोटर का नुकसान हुआ था. केवल मुस्लिम वोटर उनके साथ थे और लोकनीति और सीएसडीएस के मुताबिक पार्टी को मुस्लिमों का 28 फीसदी वोट मिला था लेकिन अब मुस्लिम वोटर भी बंटे हुए हैं. राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में कांग्रेस मजबूत पार्टी है और उन्होंने प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया को यहां बेहतर करने भेजा था. अगर कुछ सीटों पर बात करें तो मुस्लिमों के लिए गठबंधन की बजाय कांग्रेस बेहतर विकल्प है. मसलन कानपुर ऐसी ही सीट है जहां बीजेपी और कांग्रेस की सीधी टक्कर है. टिकट वितरण में अनदेखी से नाराज उम्मीदवार भी पार्टी का नुकसान कर सकते हैं. अखिलेश के कोर वोटर यादव का कुछ नुकसान उनके चाचा की पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी ने भी किया होगा.

आखिर में बात थोड़ी पुरानी करते हैं.यादवों और दलितों की अदावत यूपी में कोई पहचान की मोहताज नहीं है. यादवों का आरोप है कि बीएसपी शासन में उन पर फर्जी हरिजन एक्ट लगवाकर कार्रवाई हुई. ऐसे में दोनों पार्टियों के लिए वोट ट्रांसफर बड़ी चुनौती थी. अगर यादवों की ही बात करें तो वो बीएसपी को वोट देने के लिए नहीं जाता है जब तक बीएसपी के टिकट पर कोई यादव ही चुनाव न लड़ रहा हो.

अब बात मायावती की बीएसपी की करते हैं. हाल के वर्षों में बीएसपी के लिए अपने कोर वोटर को साथ रख पाना चुनौती रहा है. अगर 2014 चुनाव की बात करें तो सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक बीसपी ने 16 फीसदी जाटवों और अति दलितों का वोट खो दिया था. ये दिखाता है कि मायावती अब दलितों की सर्वमान्य नेता नहीं रहीं. अगर दलित लोकसभा सीटों और विधानसभा सीटों पर बीजेपी के प्रदर्शन की बात करें तो बीते सालों में ये बेहतर रहा है. बीजेपी ने 2014 में सभी सुरक्षित सीटों पर जीत हासिल की थी.वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में 86 में से 70 सीटों पर जीत हासिल की थी. 1995 के बाद दलितों और यादवों का बैर किसी से छुपा नहीं है और माना जाता है कि जहां बीएसपी के उम्मीदवार नहीं होते वहां दलित बीजेपी को वोट करते हैं. इसी के साथ टिकट न मिलने से नाराज नेता एसपी के साथ बीएसपी की चिंता भी बढ़ा सकते हैं.

जिस तरह की चुनौतियों की बात हमने एसपी बीएसपी के सामने की उसे देखते हुए लगता है कि महागठबंधन को वोट उनकी उम्मीद के मुताबिक नहीं मिलेंगे. डॉक्टर वर्मा महागठबंधन के प्रति पूरी तरह नरम रुख रखते हुए विश्लेषण में हर हालत में महागठबंधन को 35 फीसदी वोट मिलने की बात कहते हैं. बड़ा सवाल ये है कि कांग्रेस को कितने फीसदी वोट मिलेंगे. 2014 में कांग्रेस को 7.5 फीसदी वोट मिले थे. 2017 में 6.25 फीसदी वोट मिले थे. अगर प्रियंका गांधी का कुछ प्रभाव रहा होगा तो हो सकता है कि कांग्रेस को कुल 10 फीसदी वोट मिल जाएं. इस तरह महागठबंधन और कांग्रेस को मिलाकर 45 फीसदी वोट बनते हैं. अगर गैर एनडीए वाले तमाम छोटे दलों की बात करें तो उनका भी 10 फीसदी वोट जोड़कर कुल 55 फीसदी प्रतिशत गैर एनडीए दलों का होता है.

2014 में बीजेपी और एसपी के बीच 20 फीसदी वोटों का अंतर था. 2017 के विधानसभा चुनाव में ये अंतर 10 फीसदी वोटों का था और इस बार भी ऐसा ही है. ऐसे में यूपी जैसे बड़े राज्य में एनडीए, महागठबंधन पर बढ़त बनाए दिखता है.