सरकार की करीबी एक कंपनी सोचिए अगर टीवी को इतना विज्ञापन देने लगे की चैनल की बड़ी कमाई उसी से हो और बात अगर न्यूज चैनलों पर विज्ञापन की हो तब तो कमाल ही है.आप न्यूज चैनलों को ध्यान से देखिए और इनमें सिर्फ न्यूज ही नहीं विज्ञापन को भी देखिए क्योंकि चैनल का संपादक कितने दिन अपनी जगह पर टिक पाएगा ये इन्हीं पर निर्भर करता है.

.आज के दौर में देश में हर आदमी जानता है कि टीआरपी के लिए न्यूज चैनल बिके हुए हैं लेकिन वो ये नहीं जानता की कैसे एक बाबा के जरिए सरकार ने न्यूज चैनलों पर कतिथ रूप से अपनी पकड़ बना ली है.आज के दौर में टीवी पर नीचे चलने वाली ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी से लेकर ऊपर तक पूरे चैनल पर इन बाबा जी की कम्पनी का विज्ञापन ही आपको देखने को मिल जाएंगे. टीवी पर दिखने वाले लंबे विज्ञापन,हेडलाइन सबका मालिक आजकल के दौर में बाबा जी है. वो बाबा जी जो सरकार की करीबी है. जो खुलेआम मोदी सरकार के गुणगान करते है.

आज तक पर जब बाबा रामदेव के एक कड़क इंटरव्यू के बाद जब पुण्य प्रसून वाजपेयी ने चैनल से इस्तीफा दिया तो मीडिया के हलकों में थोड़ी बहुत चर्चाएं इस बात की हुईं रामदेव के दबाव में उन्हें हटाया गया.अब जब एबीपी न्यूज से संपादक सहित 3 लोगों की छुट्टी हुई तो भी लोग सरकार तक तो पहुंचे लेकिन रामदेव से इसका कोई संबंध नहीं निकाला गया.दरअसल शायद टीवी माध्यम ही ऐसा है जिसे प्रोपगेंडा फैलाने के लिए बनाया गया था.एक न्यूज चैनल को चलाने के लिए जो संसाधन चाहिए वो बगैर किसी कारपोरेट घराने की मदद के बगैर संभव ही नहीं है और कारपोरेट सिर्फ मुनाफे की भाषा जानता है.मुनाफा है तो ठीक है नहीं तो हम अपने हाथ खींचते हैं.मुनाफे के लिए जो करना होगा वो कारपोरेट करेगा.
ऐसे दौर में सबसे बड़ा विज्ञापन दाता अगर सरकार का करीबी है और वो चैनल के मालिक पर अगर दबाव डाले कि आपके चैनल पर जो चलाया जा रहा है वो सरकार के मुफीद नहीं है इसलिए हम अपना विज्ञापन आपके चैनल से हटाते हैं तो क्या होगा.जानकारी के मुताबिक एबीपी न्यूज से विज्ञापन का बड़ा हिस्सा पतंजलि वापस ले चुका था.ऐसे में चैनल की कमाई पर बड़ा असर पड़ा था.बीते कुछ दिनों से चैनल में शाम को 9-10 के बीच सिग्नल की भी दिक्कत थी खास बात ये है कि दिक्कत बढ़कर अब शाम 7 बजे से शुरु होती थी जो करीब 10.30 बजे घंटी बजाओ शो के बीच में जाकर खत्म होती थी.ऐसे में चैनल की टीआरपी पर असर पड़ रहा था जिसमें सुधार की कोई गुंजाइश ही नहीं थी.

ऐसे में चैनल के मालिकों ने संपादक पर दबाव डाला कि सरकार के विरोध में खबरें न चलाईं जाएं तो संपादक ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.अब सोचिए कि इस दौर में आप जिस पतंजलि का शुद्ध घी और आटा महंगे दामों पर खरीद रहे हैं वो किस तरह से आपके अधिकारों के साथ ही खेलने में जुटा हुआ है.सरकार से सवाल पूछना पत्रकारों का काम है.अगर सरकार दावा करती है कि किसानों की आय दोगुनी हुई है तो इस बात की पुष्टि करना और उस पर सवाल तो मीडिया ही करेगा खासतौर से तब जब विपक्ष में अंहकारी और आलसी लोगों की जमात हो जो सत्ता तो चाहते हैं लेकिन करना कुछ नहीं चाहते. 2019 का चुनाव नजदीक है सरकार शायद चाहती ही नहीं की कोई भी उसके सामने टिके जो सवाल पूछे.इसलिए उसने ऐसे लोगों को तैयार किया जिनके जरिए वो बड़ी चालाकी से मीडिया को नियंत्रित करे और लोग जब सवाल उठाए तो जवाब भी दे दिया जाए कि हम आखिर किस तरह से दबाव बना सकते हैं.बाकी सोशल मीडिया पर सरकार समर्थकों की ऐसी फौज बैठी ही है कि वो खुद ऐसे कारण निकालकर रख देंगे की सरकार को जवाब देना ही न पड़े.

कुल मिलाकर जिस बाबा के करियर की शुरुआत एक योग गुरु के तौर पर हुई थी आज उसे सरकार ने मीडिया को अनुलोम विलोम करवाने का जरिया बना लिया है.कुल मिलाकर संदेश साफ है 'तुम हमारे सामने घुटने टेको हम तुम्हें विज्ञापन देंगे.'