कुछ दिनों पहले हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन नाम की एक दवाई भारत-अमेरिका के बीच संबंधों में बड़ी अहम साबित हुई. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के रिटैलिएशन शब्द के इस्तेमाल के बाद भारत में इसको लेकर राजनीति गर्मा गई. भारत में मोदी विरोधी और समर्थक इसको लेकर अपने अपने तर्क रख रहे थे. इसी बीच सोशल मीडिया पर कई पोस्टों में दावा किया गया कि भारतीय वैज्ञानिक प्रफुल्ल चंद्र रे ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवाई बनाई थी. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने इस दावे की पड़ताल की और इसे गलत बताया है.

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन पहली बार 1940 के आस पास बनाई गई. जबकि प्रफुल्ल चंद्र रे का निधन 1944 में हुआ. मेडिकल से जुड़े इतिहासकारों का कहना है कि ये संभव नहीं है कि प्रफुल्ल चंद्र रे ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन बनाई हो. इतिहासकार सुदीप भट्टाचार्य के मुताबिक हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन और क्लोरोक्वीन पहली बार द्वितीय विश्व युद्ध के समय बनाई गई. दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दोनों पक्षों के सैनिक कई बीमारियों से पीड़ित हो गए. इनमें सबसे ज्यादा मलेरिया से सैनिक पीड़ित हुए. इसी समय दक्षिण पूर्व और दक्षिण एशिया में सिनकोना नाम के पौधे से कुनैन और एल्केलॉयड बनाए जाते थे. इनसे मलेरिया का इलाज किया जाता था. जब विश्व युद्ध लड़ रहे सैनिकों को इस बात की जानकारी मिली तो उन्होंने भी इसकी मांग की.

19वीं शताब्दी के आखिर में भारतीय उपमहाद्वीप में भी सिनकोना का पौधा लगाया जाने लगा. यहां अब के इंडोनेशिया और उस वक्त के डच ईस्ट इंडीज में सिनकोना का पौधा उगाया गया. इंडोनेशिया पर कब्जे की वजह से उस वक्त कुनैन के उत्पादन के 95 फीसदी पर नीदरलैंड का कब्जा था. हालांकि 1942 में इंडोनेशिया पर जापान ने कब्जा कर लिया और इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध लड़ रहे धुरी राष्ट्र (जर्मनी, जापान, इटली) को अपने सैनिकों के लिए जरूरी कुनैन की मात्रा मिलने लगी.

उधर अमेरिका और मित्र राष्ट्रों को कुनैन की कमी महसूस हो रही थी. ऐसे में अमेरिका ने लैटिन अमेरिका का रुख किया. लैटिन अमेरिका में सिनकोना का पौधा बड़ी तादाद में लगाया जाता है. 1942 से 1945 के बीच अमेरिका ने मिशन सिनकोना चलाया. इस दौरान कोलंबिया और इक्वाडोर से सिनकोना के पौधे लाए गए. इसके बाद अमेरिका ने बाकी लैटिन अमेरिकी देशों जैसे ग्वाटेमाला, मेक्सिको, बोलिविया, इक्वाडोर और पेरु में भी सिनकोना के पौधे लगाए ताकि कुनैन की कमी को दूर किया जा सके. 1944 में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने सफलतापूर्वक लैब में कुनैन बना ली. 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध में धुरी राष्ट्रों की हार हुई और इंडोनेशिया के सिनकोना के पौधों पर भी अमेरिका ने अधिकार हासिल कर लिया.

आपको बता दें कि हाइडॉक्सीक्लोरोक्लीन और क्लोरोक्वीन का इस्तेमाल कोरोना के इलाज के लिए किया जा रहा है. भारत अमेरिका, ब्राजील समेत कई देशों को यह दवाई भेज रहा है, हालांकि इस मेडिकल साइंस से जुड़े लोग इन दवाईयों को कोरोना का इलाज नहीं मानते और ब्राजील में कुछ लोगों पर इसके साइड इफेक्ट भी देखने को मिले हैं. ब्राजील में फिलहाल इसका इस्तेमाल बंद कर दिया गया.

ये भी पढ़े
क्या अंग्रेजो की फूट डालो और राज करो नीति के अहम् किरदार थे अंबेडकर?