दिल्ली में जब बारिश होती है तो बहुत से लोग उसको एन्जॉय करते हैं. फेसबुक के बहुत से लोग जहां होते हैं, वहीं से लाइव करने लग जाते हैं लेकिन उसी बारिश के बीच दिल्ली के तमाम झुग्गी वाले लोग होते हैं या वो लोग होते हैं जिनके घर कमजोर होते हैं. वो डरते हैं कि कहीं बारिश ना हो जाए. जब आप बारिश इंज्वाय कर रहे हैं तो उसी वक्त दूसरा कोई बारिश के पानी को अपने आशियाने में घुसने से रोकने की कोशिश कर रहा होता है. कोरोना के बीच नीले आसमान को देखकर खुश होने का केस भी कुछ ऐसा ही है. बहुत से लोग जब नीले आसमान को देखकर खुशी महसूस कर रहे हैं तो उसी वक्त कोरोना से पीड़ित लोग और उनके परिजन परेशान हो रहे हैं. तमाम लोगों के रोजगार जा चुके हैं और तमाम लोगों को तो पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर चलने के लिए मजबूर होना पड़ा. ऐसे लोगों के लिए नीला आसमान भी बिजली से गरजते बादलों की तरह है. दिक्कत ये है कि ये नीला आसमान आम दिनों में भी लोगों को देखने को मिल जाए तो ये कहीं खुशी कहीं गम का दृश्य ना बनें.

कोरोना और उसके बाद हुए लॉकडाउन से पर्यावरण, लोगों की जिंदगी में एक परिवर्तन आया है. पर्यावरण की बात करें तो दिल्ली में हवा काफी साफ हो चुकी है. यमुना का पानी नीला दिख रहा है. जिस यमुना को साफ करने की मांग की जा रही थी, अब वो खुद साफ हो चुकी है. दिल्ली में आसमान भी साफ दिख रहा है. पक्षियों की आवाजें भी आती हैं. पंजाब के जालंधर में 200 किलोमीटर दूर के पहाड़ भी नजर आने लगे हैं. लोगों की जिंदगियों की बात करें तो जो लोग परिवार को वक्त नहीं दे पाते थे वो आज परिवार के साथ भरपूर वक्त बिता रहे हैं. तमाम वो लोग जो खाना नहीं बना पाते थे, वो आज घरों में खाना बनाकर खुद खा रहे हैं. घर के तमाम कामों में दिलचस्पी ले रहे हैं. हम सभी की जिंदगी में कोरोना और लॉकडाउन की वजह से यह बदलाव आए हैं. ऐसे में हम ना चाहते हुए भी कोरोना को धन्यवाद दे डालते हैं. सवाल ये है कि क्या ये बदलाव ऐसे हैं जो लॉकडाउन और कोरोना के बगैर संभव नहीं थे ? सभी का जवाब शायद ना होगा. इनमें से सबकुछ बगैर कोरोना के भी हो सकता है लेकिन हम करना नहीं चाहते. बहुत से लोग अब ये बातें कर रहे हैं कि साल में एक बार 15 दिन या हर महीने एक बार जरूर देश को लॉकडाउऩ करना चाहिए.

दरअसल हमारी जिंदगी से लेकर देश तक अव्यवस्थित घर की के तहत रहा है, जिसमें कुछ भी एक सिस्टम की तरह नहीं होता. दिल्ली में सर्दियों के वक्त में प्रदूषण चरम पर होता है. इसको लेकर बैठकें होती हैं, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होती है और ऑड-ईवन का फॉर्मूला लगा दिया जाता है. एक स्थायी हल कभी नहीं ढूंढा जाता. फैक्ट्रियां वैसे ही चलती रहती हैं,दिल्ली के पड़ोस में नोएडा-गाजियाबाद में वाहन वैसे ही चलते हैं. सर्दियां खत्म होती हैं तो हालात अपने आप कुछ सुधर जाते हैं. प्रदूषण को लेकर गंभीरता से कभी फैसला नहीं किया जाता. जब ज्यादा प्रदूषण हो तब कम से 5 दिन का तो लॉकडाउन किया जा सकता है. ये लॉकडाउन कुछ अंतराल पर भी हो सकता है. इसके साथ ही दिल्ली-NCR के बोझ को भी कम करने का प्रयास किया जा सकता है. यहां कि इंड्रस्ट्री को देश के बाकी हिस्सों में भी ले जाया जाए लेकिन ऐसा नहीं किया जाता और लोग उसी कड़वी हवा में जीने को मजबूर रहते हैं.

दिल्ली के प्रदूषण की तरह ही हमारी अपनी जिंदगी भी है. हम चाहें तो इसे व्यवस्थित कर सकते हैं लेकिन सिर्फ पैसा कमाने की होड़, काम का प्रेशर हमारी अपनी जिंदगी को खत्म कर देता है. क्या जो कंपनियां अब लोगों को वर्क फ्रॉम होम का विकल्प दे रही हैं वो पहले नहीं दिया जा सकता था? संभव है कि हफ्ते में 2 दिन का वर्क फ्रॉम जैसा विकल्प लोगों को दिया जाए. ऐसे में सड़कों से भीड़ भी कम होगी और लोगों को परिवार के साथ वक्त बिताने का मौका भी मिलेगा.इसकी मांग तो आखिर लोगों को ही करनी पड़ेगी. घर के कामों में हाथ बंटाने की प्रवृत्ति भी लोगों में बढ़ेगी. इसी तरह हम तय करें कि हमारे घरों में काम करने वाले जैसे खाना बनाने वाले और बर्तन धोने वाले लोगों को महीने में कुछ छुट्टी जरूर दें. उस दिन कोशिश करें कि हम घर का काम खुद करें. बाहर खाना खाने या मंगाने की बजाय घर में खुद से बनाए. ऐसा करने से आप के यहां काम करने वाले लोगों को राहत भी मिलेगी और तमाम लोग घर का काम भी सीख जाएंगे. आखिर हमारा खुद से कोई काम कर लेना हमें ही फायदा पहुंचाता है.

21 दिनों का लॉकडाउन आगे बढ़ सकता है. लॉकडाउन के ये दिन हमारे लिए खुद के और समाज के बारे में सोचने का एक वक्त है. खुद में तमाम सुधार लाने का वक्त है. कोशिश करें कि वो तमाम सुधार खुद में लाएं और भविष्य के लिए खुद को तैयार करें ताकि आगे कभी कोरोना जैसी महामारी को प्रकृति और खुद में ऐसे सुधारों के लिए अनचाहा धन्यवाद ना करना पड़े.