बीते दिनों अभिनेता सुशांत सिंह ने फांसी लगाकर जान दे दी. उनकी मौत के बाद सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हुई. लोगों ने मेंटल हेल्थ के बारे में बहुत कुछ लिखा और बॉलीवुड का भाई-भतीजावाद एक बार फिर से निशाने पर आ गया. करण जौहर और तमाम स्टार किड्स की लोगों ने काफी आलोचना की. भाई-भतीजावाद के खिलाफ मुखर रहने वाली अभिनेत्री कंगना रनौत ने एक बार से खुलकर अपनी राय रखी. दरअसल खबरों के मुताबिक सुशांत सिंह राजपूत को पिछले 6 महीनों में 7 फिल्मों से निकाला जा चुका था. इतना ही नहीं, उन्हें कई प्रोडक्शन हाउस ने बैन भी कर दिया था. सुशांत पिछले 6 महीने से डिप्रेशन से जूझ रहे थे और आखिरकार उन्होंने खुदकुशी कर ली.

बॉलीवुड के इस भाई-भतीजावाद पर बहस में दबंग फिल्म का निर्देशन करने वाले अभिनव कश्यप भी सामने आए. उन्होंने कहा कि सलमान खान और उनके भाईयों ने उन्हें काफी परेशान किया और फिल्म की रिलीज तक रोकने की कोशिश की. सुशांत की मौत के बाद बॉलीवुड के कुछ लोगों का साम्राज्यवादी चेहरा सामने आया है लेकिन ये साम्राज्यवादी लोग दरअसल हर जगह, हर स्तर पर मौजूद होते हैं. आप जैसे जैसे जिंदगी में आगे बढ़ेंगे, आपको इनका सामना करना पड़ेगा. ऐसे लोग हमेशा चाहते हैं कि वो आप पर हमेशा नियंत्रण रखें और आपका कामयाब होना या नाकामयाब होना, उनके हाथों में रहे. ऐसे लोग आपके घर-परिवार, ऑफिस हर जगह मौजूद हो सकते हैं.

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एक मध्यमवर्गीय परिवार को देखिए, इनमें अक्सर पैसे वाले रिश्तेदार चाहते हैं कि इस परिवार के लोग हमेशा इनकी बातें मानें. हमेशा इनकी सेवा के लिए तैयार रहें. इस परिवार के बच्चे कहां पढ़ेंगे, आगे भविष्य में क्या करेंगे, सब कुछ तय करने की कोशिश करते हैं. अगर इनकी बातें न सुनी जाएं तो तरह तरह के ताने देंगे और परिवार में अलग थलग करने की कोशिश करेंगे. आप ऑफिसों में देखिए, अक्सर कोई बिना वजह आपकी मदद करने की कोशिश करता है. ऐसी मदद जो सबकी नजर से छिपी हुई होगी, आप इसे स्वीकार कर लीजिए और जी हुजूरी में लग जाइए तो ठीक अन्यथा अलग थलग और परेशान रहने के लिए तैयार हो जाइए. ये सब कुछ एक लॉबी बनाकर होता है. राजनीति की तो 'राजनीति' खुलकर दिखती ही है और बॉलीवुड में काफी कुछ पहले से साफ था और सुशांत की मौत के बाद तो तस्वीर और भी साफ हो गई है.

आज कल पत्रकारिता पर बड़ी चर्चा होती है. हर कोई कहता है कि पत्रकारों को सत्ता के खिलाफ होना चाहिए. दरअसल हम सबके आस पास कुछ सत्ताएं होती हैं और वो हमेशा ही रहती हैं, इन्हें खत्म नहीं किया जा सकता. आर्थिक, सामाजिक विषमवताएं ऐसी सत्ताओं को जन्म देती हैं. इन सत्ताओं को नजरअंदाज करना ही एकमात्र विकल्प हो सकता है. हालांकि इन सत्ताओं का प्रभाव कितना है, इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है. कई बार सिर्फ नजरअंदाज करने से ही काम चल जाता है और कई बार लड़ना पड़ता है. लेकिन कुछ भी हो, किसी को हार नहीं मानना चाहिए. बॉलीवुड में ही देखिए शाहरूख, इरफान जैसे अभिनेताओं ने किस तरह जगह बनाई. लोगों को पत्रकारिता का ज्ञान अपने जीवन में लागू करने की ज़रूरत है. रोज फेसबुक और ट्विटर पर बड़ी सरकारों को छोड़िए, पहले अपने आस-पास की इन सरकारों के खिलाफ बोलिए और इन्हें निराशा की गर्त में धकेल दीजिए.

सुशांत राजपूत की मौत दुखद है लेकिन शायद इतनी मेहनत के बाद और इस मुकाम को पाने के बाद सुशांत को और लड़ना चाहिए था. लोग सुशांत को पसंद करते थे, बहुत दिनों तक उन्हें रोक पाना मुश्किल होता. हालांकि किसी के बारे में बोलना हमेशा आसान होता है, उसकी हालत को समझना बेहद मुश्किल लेकिन फिर भी लगता है कि सुशांत लड़ना चाहिए था. सुशांत की जिंदगी से हमारे पास सीखने के लिए यही है कि अपने आस-पास के लोगों को पहचानिए और इससे पहले की कोई आपको अकेला करने की कोशिश करे, उसे ही अलग-थलग कर दिया जाए.