इरफान खान... सामान्य चेहरा... साधारण शरीर... लेकिन बोलती आंखों के अभिनय से उस शख्स ने लाखों लोगों को अपना कायल बना दिया। उनके देहांत पर 'अपूर्ण क्षति' जैसे शब्द बेमानी लगते हैं क्योंकि इरफान और उनका अभिनय ने हमारे दिल के किसी कोने में घर बना रखा है। वह पिछले दो साल से कैंसर से लड़ रहे थे और कल मुंबई के एक अस्पताल में आखिरी सांस ली। उनकी मां का इंतकाल भी 4 दिन पहले ही हुआ था। इरफान के आखिरी सफर से पहले के शब्द थे, 'मां मुझे लेने आई हैं।'

बॉलीवुड में हमेशा से चॉकलेटी सूरत वाले अभिनेताओं का ही बोलबाला रहा है। कई अच्छे अभिनेताओं ने अपने बेजोड़ अभिनय से जगह तो बनाई लेकिन वे ज्यादातर चरित्र भूमिकाओं तक ही सीमित रहें। बलराज साहनी और खलनायक के रूप में करियर के ढलान पर आने के बाद प्राण जैसे कलाकारों ने चरित्र अभिनेता के तौर पर छाप छोड़ी थी। उसे बाद में नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी और परेश रावल जैसे धुरंधरों ने आगे बढ़ाया। हालांकि इनकी पहुंच सीमित थी। इरफान ने सही मायने में चरित्र अभिनेता को फिल्म का नायक बना दिया। इसमें उन्हें अपने समकक्ष मनोज वाजपेयी का भी भरपूर सहयोग मिला। इन दोनों दिग्गजों ने देश के आम आदमी को बड़े परदे लाकर उसे हीरो बनाया। इन्होंने जो लकीर बनाई है उसी को नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राजकुमार राव और आयुष्मान खुराना नए मुकाम पर पहुंचा रहे हैं।

पाइरेट्स ऑफ कैरेबियंस का वो सूखा कलाकार जिसकी एक झटके में आंख निकल जाती थी!

पहले फिल्मकार कई गंभीर मसलों को परदे पर लाने से परहेज करते थे क्योंकि उस तरह की फिल्मों के लिए नामीगिरामी अभिनेता तैयार ही नहीं होता था। इरफान ने इस मिथक को तोड़ा। उन्होंने 'लंच बॉक्स' के साजन फर्नांडिस को फिल्म का नायक बनाया। उन्होंने हिंदी मीडियम के राज बत्रा को दर्शकों का प्यार दिलाया। उन्हीं की बदौलत पान सिंह तोमर बड़े परदे पर आकर बोल सका, 'बीहड़ में तो बागी रहते हैं डाकू तो मिलते हैं पार्लियामेंट में।' इरफान ने ही सिने जगत को छात्र राजनीति पर 'हासिल' जैसी क्लासिक फिल्म दी। इस फिल्म में छात्र नेता रणविजय सिंह के डायलॉग, 'और दान से मार देना बेटा, हम जिंदा रह गए ना तो मारने में देर नहीं लगाएंगे, भगवान कसम' को भला कौन भूल सकता है।
इरफान के अभिनय का सफर दूरदर्शन के सीरियल से शुरू होकर हॉलीवुड तक पहुंचा जो बॉलीवुड के न जाने कितने चमकते सितारों का सपना होता है। उनके हुनर का लोहा हॉलीवुड ने भी माना और उन्हें कई दमदार फिल्मों के साथ बेहतरीन कलाकारों और निर्देशकों के साथ काम करने का मौका भी मिला। हॉलीवुड के दिग्गज कलाकार भी उनके अभिनय को पसंद करते थे। 'आज तक' के पत्रकार रहे पीयूष पांडे फेसबुक पर एक इरफान से जुड़ा एक किस्सा साझा करते हैं, 'इरफान न्यूयॉर्क के एक रेस्तरां में अपने दोस्त आदित्य भट्टाचार्य और एजेंट के साथ बैठे थे। वहां उनकी पीछे की सीट पर मार्वल की एवेंजर्स सीरीज में हल्क का मशहूर किरदार निभाने वाले मार्क रफैलो भी बैठे था। इरफान की दिली इच्छा थी कि वह मार्क को हैलो कहें। उन्होंने आदित्य से कहा- यार,मैं मार्क को बहुत पसंद करता हूं, उनसे छोटा सा हैलो तो बोल ही सकते हैं। हालांकि उनके साथ के लोगों को यह अच्छा नहीं लगा कि इरफान उठकर मार्क के पास जाएं। उनकी टीम लंच के बाद उठकर जाने लगी. इरफान को अफसोस था कि वह मार्क को हैलो नहीं बोल पाएं। इसके बाद जो हुआ वह इरफान के बिल्कुल अप्रत्याशित था। मार्क की नजर गेट के पास पहुंचे इरफान पर पड़ी और उन्होंने हाथ हिलाकर कहा- हे मैन, आई लव योर वर्क।'

फिल्मी कलाकारों का अमूमन विवादों से नाता रहता ही है। लेकिन यह शायद इरफान का अभिनय के प्रति प्यार ही था कि उनका पूरा करियर बेदाग रहा। इरफान के असमय जाने पर हर किसी ने शोक प्रकट किया। यही वह अनमोल कमाई है जिसे लेकर इरफान ने इस दुनिया को छोड़ा है। उनकी जिंदगी और करियर हर किसी के सबक है कि अपना काम पूरी लगन से करते रहना ही इंसान की सबसे बड़ी सफलता है। यही उसके मूल्यांकन का आधार होता है। बाकी सबकुछ दुनियादारी है।

इरफान की 'अंग्रेजी मीडियम' हाल ही में रिलीज हुई थी। इरफान ने फिल्म से पहले अपने प्रशंसकों को एक भावुक संदेश देकर फिल्म देखने की अपील की थी। इस अपील में वह कहते हैं, 'यह फिल्म आपको सिखाएगी, हंसाएगी, रुलाएगी और फिर हंसाएगी शायद।' अपील के आखिर में इरफान कहते हैं, 'वेट फॉर मी।' लेकिन क्रूर नियति की वजह से अब इरफान के लाखों प्रशंसकों का इंतजार कभी खत्म नहीं होगा। अबइरफान की पुरानी फिल्में ही हमें सिखाएंगीं, हंसाएगीं, रुलाएंगीं और शायद फिर हंसाएगीं। उन्हें अलविदा कहना हर किसी के लिए मुश्किल है। फिर भी कहना तो होगा ही...अलविदा इरफान।