नेटफ्लिक्स की वेबसीरीज सैक्रेड गेम्स में महाराष्ट्र के गृहमंत्री विपिन भोंसले के शब्दों में कहें, तो 'देश संकट में है'. सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जांच में जुटे मीडिया के लिए अपना ध्यान बाकी केसों में देना मुश्किल हो रहा है. चीन के साथ सीमा पर हालात तनावपूर्ण हैं. कोरोना केस बढ़ रहे हैं और कोरोना और लॉकडाउन के बीच अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता हो चुकी है. बेरोजगार युवा पीएम मोदी के वीडियो को डिसलाइक करके गुस्सा निकाल रहे हैं. इन सब समस्याओं के बीच कंगना रनौत एक दम 'वीरांगना' की तरह डटी हैं और लगातार खबरों में जगह बनाने में कामयाब हो रही हैं.

कंगना रनौत को आज देखता हूं तो लगता है कि देश का राइट विंग भी एक स्वरा भास्कर की तलाश में कामयाब हो गया है. लेफ्ट वालों को शायद अब पता चले कि इसी तरह स्वरा भास्कर ने देशवासियों को अपने कुतर्की बयानों से कितनी हानि पहुंचाई है. सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध हालात में मौत हुई. पहली नजर में मामला आत्महत्या का लग रहा था, और पहला निशाना बने इंडस्ट्री में नेपोटिज्म फैलाने वाले लोग. कंगना ने सबसे पहला वार वहीं किया. हालांकि वो पहले भी नेपोटिज्म के खिलाफ बोल रही थीं

लेकिन सुशांत की मौत के बाद तो वो एक दम खुलकर बोलने लगीं. देशवासियों का उन्हें प्यार मिला और अर्नब गोस्वामी का साथ. दोनों की जोड़ी सुशांत केस के साथ आगे बढ़ने लगी. फिलहाल सुशांत केस में ड्रग्स एंगल पर जांच हो रही है और कंगना और अर्नब भी वहीं पर अटैक कर रहे हैं. दोनों की खासियत है कि पहली नजर में अपनी तरफ से दावा ऐसे करते हैं जैसे इनकी बात एक दम पक्की है फिर सीबीआई जैसे ही आगे बढ़ती है ये लोग भी उधर ही बढ़ जाते हैं. कह सकते हैं कि सीबीआई अंधेरे में टार्च लेकर शांति से आगे बढ़ रही है और कंगना-अर्नब उसी के पीछे चलकर चोर चोर पकड़ा का हल्ला लेकर आगे बढ़ते जा रहे हैं.

फिलहाल कंगना के निशाने पर हैं शिवसेना के 'स्वघोषित' चाणक्य, शायर संजय राउत जी. कंगना राउत जी फिलहाल भारतीय लिबरल तबके से उसी के अंदाज में खेल रही हैं. संजय राउत और बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना देश के लिबरल तबके की सबसे नए सदस्य हैं. नरेंद्र मोदी सरकार के हमलों, राहुल गांधी की असफलता और ट्विटर पर राइट विंग की गालियों से परेशान भारत का लिबरल तबका बाला साहब ठाकरे के पौत्र आदित्य ठाकरे में अपना युवा तुर्क तलाश रहा है. आदित्य ठाकरे अपने पिता उद्धव ठाकरे के साथ मिलकर लिबरल तबके के लाड़ प्यार का जमकर लुत्फ़ उठा रहे हैं. ऐसे में उन्होंने बाला साहब की कट्टर लीगेसी को आगे बढ़ाने का जिम्मा शायर संजय राउत को दे रखा है.

संजय राउत शिवसेना के पुराने सेवक हैं. कई साल पहले बीजेपी के साथ गठबंधन में होते हुए, जब संजय राउत बीजेपी के खिलाफ कुछ उल्टा सीधा बोलते, तो बीजेपी से गठबंधन धर्म का पालन करते हुए शिवसेना बड़ी आसानी से उनके बयान को निजी बताते हुए पल्ला झाड़ लेती. हालत ये थी कि संजय राउत के बोलने के बाद मीडिया इंतजार करने लगी थी कि इसे शिवसेना का बयान लिखकर चलाया जाए या नहीं. खैर आज संजय राउत उस स्थिति में है जब उनके बयान को शिवसेना का आधिकारिक माना जाने लगा है. ऐसे में उनका खुद को चाणक्य समझना गलत नहीं समझा जाना चाहिए वैसे भी अमित शाह के उभरने के बाद देश की कई पार्टियों में ऐसे छोटे छोटे चाणक्य पाए जाने लगे हैं.

खैर मुद्दे पर आते हैं. कंगना ने संजय राउत पर धमकी देने का आरोप लगाया. बदले में संजय राउत जी ने शिवसेना की लीगेसी को आगे बढ़ाते हुए कंगना को 'हरामखोर' बता दिया. अब कंगना, संजय राउत जी पर अपशब्द कहने का आरोप लगाते हुए (जो कि सच भी है) हल्ला कर रही हैं. देश के लिबरल तबके के कई लोग 'कुछ भी बोलो, गाली खाओ' योजना के तहत ट्विटर से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पर पहचान बना चुके हैं. यहां स्थिति थोड़ी सी अलग है जहां बीजेपी के ट्विटर ट्रोल लिबरल तबके को गाली देते हैं यहां शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत जी ने खुद ये जिम्मेदारी उठा ली. बड़े-बड़े नेता, अभिनेता इससे पहले मातोश्री जाकर माफी मांगते रहे हैं, लेकिन यहां माफी मांगने की तो दूर उल्टे और भी तगड़े हमले कर रही हैं. राउत जी का शिकार करने के बाद कंगना का अगला शिकार देश का लिबरल तबका होने वाला है. दरअसल लिबरल तबका अपनी आदत के मुताबिक स्त्री सम्मान की बिल्कुल भी चिंता न करते हुए संजय राउत पर चुप रहेगा और नतीजे में कंगना के नेतृत्व में राइट विंग की ट्रोल टोली का शिकार बनेगा.

अभी की हालत देखकर लगता है कि कंगना को फिलहाल बॉलीवुड में शायद ही कोई फिल्म मिले. बड़े बड़े निर्देशकों और लॉबी के खिलाफ वो इतना ज़्यादा बोल चुकी हैं कि लगता नहीं कि कोई उन्हें काम देगा. दूसरी तरफ उन्होंने नरेंद्र मोदी का झंडा भी उठा रखा है. ऐसे में नरेंद्र मोदी और बीजेपी समर्थकों का एक बड़ा वर्ग कंगना का प्रशंसक है. कंगना फिलहाल इसी समर्थक वर्ग के ऊपर फिल्में बनाएंगी. उनकी आने वाली फिल्म का नाम तेजस है. इस फिल्म में कंगना एक फाइटर पायलट का किरदार निभाएंगी. कंगना का ये रूप राष्ट्रवादी फिल्मों की उसी लीक पर होगा जिस पर बीते कुछ सालों में अक्षय कुमार चले हैं. कुल मिलाकर कंगना राष्ट्रवाद के घोड़े पर सवार होकर सफलता पाएंगी और नेपोटिज्म वालों को ठेंगा दिखाएगी. कंगना ने राष्ट्रवाद को यहां पर नेपोटिज्म से अपनी मुक्ति के एक साधन के तौर पर इस्तेमाल किया है और आत्मनिर्भर बन गई हैं. कोरोना काल में उन्होंने बॉलीवुड की एक अलग धारा की एक्टिविस्ट के तौर पर पहचान बनाई है. वो बॉलीवुड की 'सत्ता' के खिलाफ हैं और देश की सत्ता के साथ हैं. उन्होंने एक जबरदस्त कॉकटेल अपने लिए तैयार किया है.

जब-जब कंगना बोलती हैं, तब-तब 'अति का भला न बोलना' वाला दोहा याद आता है और लगता है कि कंगना को ऐसे नहीं बोलना चाहिए. लेकिन शायद ये 'अति का ही काल है' जहां यही सब कुछ है. कंगना ने कोरोना काल में बॉलीवुड की एक अलग धारा की एक्टिविस्ट के तौर पर पहचान बनाई है. वो बॉलीवुड की 'सत्ता' के खिलाफ हैं और देश की सत्ता के साथ हैं. उन्होंने एक जबरदस्त कॉकटेल अपने लिए तैयार किया है. उन्होंने सफलता का एक अलग फॉर्मूला तैयार किया है और जिसमें वो फिलहाल कामयाब नजर आती हैं. अभी की हालत में कंगना सफल हैं और आगे भी सफल ही होती नजर आ रही हैं.