तीन तलाक़: मुस्लिम महिलाओ की बेहतर जिंदगी के लिए सरकार से और भी उम्मीदे

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Nishant Trivedi Wed, 08/23/2017 - 22:38 Triple Talaq, Muslim women

तीन तलाक को भारत की शीर्ष अदालत ने असंवैधानिक ठहरा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि वो 6 महीने के अंदर कानून बनाकर इस प्रक्रिया को पूरा करे। इस फैसले की देश के करीब सभी राजनीतिक दलों ने स्वागत किया वहीं मुस्लिम महिलाएं भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से काफी खुश दिखाई दीं। हालांकि हमेशा की तरह धर्म के ठेकेदारों ने इस फैसले का विरोध किया। कुछ ने तो इसे जज्बाती निर्णय भी बताया।

कोर्ट का ये निर्णय वाकई स्वागत योग्य है। इसे असंवैधानिक ठहरा कर सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को एक बड़ा अस्त्र दिया है जिससे वो अपने खिलाफ होने वाले अन्याय को रोक सके। कानूनी तौर पर अब वो इसके खिलाफ आवाज उठा सकती हैं। सरकार ने शुरूआत से ही तीन तलाक को लेकर चिंता जताई थी और सुप्रीम कोर्ट में भी इसके खिलाफ मजबूती से अपना पक्ष भी रखा था। हालांकि बहुत से लोग सरकार के रूझान को राजनीतिक भी बताते रहे हैं।

इस पूरे मामले की सरकार की भूमिका के बारे में कई महात्वपूर्ण तथ्य हैं –

अगर सरकार का तीन तलाक को लेकर रूख राजनीतिक कारणों की वजह से भी था तब भी वो एक कुरीति के विरूद्ध था जिसने सीधे तौर पर संविधान को चुनौती दे रखी थी ऐसे में इसका खत्म होना जरूरी है। सरकार की दूसरी भूमिका वाकई और भी गंभीर होने वाली है और वो इस बात का निर्णय भी कर देगी कि सरकार वास्तव में अपनी अब तक की भूमिका को लेकर गैर राजनीतिक थी।

दरअसल हम सबने टीवी पर उन तमाम हंसते हुए मुस्लिम महिलाओं के चेहरों को देखा जिन्होंने इस फैसले का स्वागत किया लेकिन इनकी संख्या कितनी थी। वास्तविकता में मुठ्ठी भर रही होंगी। वो महिलाएं वास्तव में संघर्ष की प्रतीक हैं लेकिन उन बाकी न जाने कितनी महिलाओं का क्या जो चाहते हुए भी अपने घर में भी इस फैसले को लेकर खुशी नहीं जताई पाई होगीं।

कुछ दिनों पहले एक यात्रा के दौरान एक मुस्लिम दंपती बस में चढ़े। बस में भीड़ बहुत ज्यादा थी। सबसे पीछे एक व्यक्ति के बैठने की जगह थी। मुस्लिम महिला को वहां बैठे हुए लोगों आराम से बैठा लिया। इस सबके बीच उनके पति अपना सामान सेट करने में व्यस्त थे जिसकी वजह से वो ये देख नहीं पाए। जैसे ही वो अपने काम से फारिब हुए उन्होंने अपनी पत्नी को बैठे देखा। उन्हें ये बिल्कुल भी पसंद नहीं आया कि उनकी पत्नी उस जगह पर बैठे क्योंकि वहां पर कई पुरूष बैठे थे। उन्होंने अपनी पत्नी को बड़ी सख्ती से आदेश दिया कि वो वहां से उठें। वो महिला तुरंत ही उस जगह से खड़ी हो गईं और लगभग 40 मिनट का भरी भीड़ का सफर उन्होंने खड़े खड़े ही तय कर दिया। इस घटना का जिक्र मैंने इसलिए किया ताकि आप ये देख सकें कि महिलाओं के मौलिक अधिकारों की स्थिति क्या है। बहुत सी मुस्लिम महिलाओं को आज भी घरों में टीवी और रेडियो को सुनने की आजादी नहीं हैं। वो आज भी वोटिंग मशीन में वोही बटन दबाती हैं जो उनके पति बताते हैं। शिक्षा की स्थिति बेहदी ही खराब है। 10वीं , 12वीं तक की शिक्षा भी मुश्किल से हो पाती है। प्राइमरी स्तर की शिक्षा मदरसों में होती हैं जहां इस्लामिक शिक्षा के नाम पर आधुनिक शिक्षा से उन्हें दूर रखा जाता है। परिवार नियोजन की स्थिति बेहद ही खराब है। 7-8 बच्चों को जन्म देने के बाद इन महिलाओं के खुद के पोषण का कोई ठिकाना नहीं होता है।

इस तरह हम देखें तो मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन आज भी हो रहा है और वो  इसके खिलाफ आवाज उठानें में बेहद में कमजोर हैं। ऐसे में अगर उन्हें कोई तीन तलाक के नाम पर आज भी उत्पीड़ित करने का प्रयास करेगा भी तो वो अपनी आवाज ठीक से उठा पाएगीं इसमें संदेह हैं।

ऐसे में सरकार से ये उम्मीद की जाती है वो तीन तलाक को खत्म करने पर ही न रूककर आगे भी बढ़ेगी और मुस्लिम महिलाओं के सर्वांगीँण विकास के लिए काम करेगी जिससे उन्हें सामाजिक पिछड़ेपन और उत्पीड़न से मुक्ति दिलाएगी। 

 

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