सहारनपुर हिंसा: जातिओ की सामंती सोच और शासन करने की प्रवत्ति का परिणाम

Nishant Trivedi's picture
Nishant Trivedi Tue, 05/30/2017 - 01:58 Saharanpur Violence, Dalit

सहारनपुर में भड़की जातीय हिंसा से जुड़ा हुआ एक वीडियो देख रहा था। समाचार वेबसाइट द क्विंट के बनाए हुए इस वीडियो में एक लड़की ये कहते हुए दिख रही है "हमें हरिजन मत कहो ,हरिजन नहीं है हम।" बेशक एक देश में जहाँ दलितों का वर्षों तक शोषण हुआ एक दलित का पूर्ण आत्मविश्वास के साथ ये कहना शुभ संकेत है। मगर समझने वाली बात ये है कि आख़िर दलितों को हरिजन शब्द से इतनी आपत्ति क्यों है। दलितों के लिए ये शब्द महात्मा गांधी ने इस्तेमाल किया था। उनकी एक पत्रिका का नाम भी हरिजन था। हरिजन का अर्थ है भगवान की संतान होना। गांधी जी ने वैचारिक सुधारों की भावना पर हमेशा ज़ोर दिया। उनका मानना था कि जिन दलितों को समाज हीन नज़र से देखता है उन्हें हरिजन कहने से समाज में दलितों के प्रति नज़रिए को बदलने में मदद मिलेगी।
महात्मा गाँधी के सिद्धांतों पर आज भले ही आज सिर्फ लोग बोल कर शांत हो जाते हैं लेकिन राष्ट्रपिता का दर्जा उन्हें ऐसे ही नही मिला था। लोग उन्हें सुनते थे मानते थे। महात्मा गाँधी के अनुसार समाज में छुआछूत सबसे बड़ी समस्या थी और उनका मुख्य उद्देश्य इसे ख़त्म करना था। गाँधी ने ही संसद में दलितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था का समर्थन किया था। दलितों को हरिजन कहने का उनका तात्पर्य ये था कि वो दलितों को हिंदुओं से अलग करके नहीं देखते थे। वो चाहते थे कि बग़ैर टकराव के समाज से बुराइयाँ दूर हों और पारदर्शी और स्वच्छ भारत का निर्माण हो। महात्मा गाँधी ने सर पर मैला भी ढोया। उस क़दम को अपनाने का मक़सद दलितों की दशा में वैचारिक रूप से परिवर्तन हो। उन्हें उनका हक़ मिले। वो बराबरी से रहे। समाज के तौर पर तभी रह सकता है ज़ब उसमें बराबरी हो। टकराव न हो। जब दलितों का शोषण होता था समाज तब भी अव्यवस्थित था। अगर बजाय बराबरी के यहाँ इस तथ्य पर ही हम चलने लगे कि जो ताक़त में आए वो बाकी के सामने ख़ुद को उच्च दिखाने का प्रयास करे तो शायद समाज में कभी शांति नहीं रहेगी। वो हमेशा टकराता रहेगा क्योंकि समाज गतिशील है इसमें परिवर्तन होते रहते हैं।
सहारनपुर में जो हिंसा भड़की है वो उसी सामंती सोंच का परिणाम है। दोनों में से एक समाज तो पहले से ही उच्च वर्ग में आता है तो दूसरे ने ख़ुद को उसी के पास पहुँचा दिया है। उसे भी गांधी का रास्ता पसंद नहीं आया। उसने बराबरी तो हासिल की लेकिन बजाय शांति के टकराव का रास्ता चुना। एक शख़्स दिखाया जाता है उस वीडियो में ख़ुद को भीम सेना का मुख्य संयोजक दिखता है। वो भीमराव अंबेडकर के वाक्य के बारे में बताते हुए कहता है कि बाबा साहब ने कहा था कि जाओ और अपने घर की दीवालों पर लिख दो कि हम इस देश के शासक हैं। वो आगे कहता है कि मैं अपने समाज को शासक बनाता चाहता हूँ। सवाल इस बात का है कि हर कोई शासक ही क्यों बनना चाहता है। वीडिओ में जो नारे लगाए जा रहे हैं उनमें भी गाँधी ग़ायब हैं।
बेशक दलित उत्थान को लेकर कई विचारधाराएँ हैं । सबका सम्मान किया जाना चाहिए लेकिन शायद गाँधी को इस तरह नकारना नहीं चाहिए। विचारधाराओं के रास्ते पर चलने से पहले एक बार ये देखना चाहिए कि इनके परिणाम क्या होगें । बीते दिनों में समाज में काफ़ी बदलाव आया है। छुआछूत पर काफ़ी लगाम लगी है। इस सबके साथ ज़रूरी है कि संतुलन को साधा जाए।  सवर्ण समाज को भी बदलते समाज को स्वीकारना चाहिए। जड़ता और घमंड से बाहर आकर एक सकारात्मक समाज के निर्माण में योगदान करना चाहिए ताकि सहारनपुर जैसी घटनाएँ दोबारा न घटित हों।
भीम सेना हो या कोई और सेना। दलित हो या राजपूत ये शासक बनने और शासन करने की प्रवृत्ति ज़ब तक रहेगी तब तक इसी तरह के जातीय संघर्ष हमें देखने को मिलते रहेगें।

(Blog send by our reader Shekhar Gautam. You can also share your views, articles with us at editor@thepeoplepost.com)

up
21 users have voted.

Post new comment

Filtered HTML

  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Allowed pseudo tags: [tweet:id] [image:fid]
  • Lines and paragraphs break automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.
CAPTCHA
This question is for testing whether or not you are a human visitor and to prevent automated spam submissions.