मोदी विरोध कर मीडिया के कंधे पर सवार अरुण शौरी ने एक किताब लिखी थी 'वर्शिपिंग फाल्स गाड'

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shashank trivedi Mon, 06/12/2017 - 02:57 Arun Shourie, NDTV, BJP

इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व एडिटर अरूण शौरी एक बार फिर से चर्चा में हैं। एनडीटीवी के प्रमोटर प्रणय राय के घर और आफिस में पड़े छापों के बाद वरिष्ठ पत्रकारों के एक सम्मेलन में उन्होंने मोदी सरकार को आड़े हाथों लेते हुए चेतावनी दी।
पत्रकारों को उन्होंने राजीव गाँधी के दौर की याद दिलाते सत्ता से ज़ोरदार टक्कर लेने की बात कही। इसके बाद कई वो एक फिर से चर्चा में आ गए। बीबीसी हिंदी के आर्टिकल में राजेश जोशी ने उन्हें मोदी सरकार के समक्ष कठिन चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया।
ऐसे में ज़रूरी है कि अरूण शौरी के बारे में आप जानें उनके सफ़र के बारे में
इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर के तौर पर -
इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर तौर पर अरूण शौरी ने दो कार्यकालों में काम किया। अरूण ने पहले कार्यकाल में एडिटर के तौर पर अपनी नियुक्ति का रोचक वर्णन किया है। आउटलुक के पत्रकार महेश शर्मा को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने इस बारे में बताया था " मैं बेंगलोर में रामनाथ गोयनका के घर में रूका था। गोयनका ने मुझसे पूछा कि मैं कि क्या कर रहा हूँ। मैंने जवाब दिया मुझे कोई जाब नहीं मिली है दो किताबें लिख रहा हूँ । गोयनका का जवाब था स्टूपिड कोई भी तुम्हारी किताबें पढ़नें नहीं जा रहा है। मेरे पास एक यंग पर्सन की कमी है मेरे पास आओ मैं एडिटर को तुम्हारे लिए किसी बड़े रोल के लिए कह दूँगा ।
शौरी के अनुसार इंडियन एक्सप्रेस के लिए ये उनका नियुक्ति पत्र था। इसके बाद उनका इंडियन एक्सप्रेस के साथ सफ़र शुरू हुआ।
शौरी के समय में इंडियन एक्सप्रेस ने भागलपुर दंगों से लेकर सीमेंट और आयल घोटाले में रिपोर्टिंग करके कांग्रेस सरकार को बैकफ़ुट पर धकेल दिया।
शौरी ने अपने समय में इंडियन एक्सप्रेस के एक रिपोर्टर को कमला नाम की एक महिला को ख़रीदने के लिए कहा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट और कई ख़ास लोगों को पत्र लिखकर उन्होंने बताया कि ये दिखाता है कि किस तरह देश में लगातार नियम और क़ानून टूटते हैं।
बेशक रामनाथ गोयनका को आपातकाल के दौर में सत्ता के कठिन प्रतिरोध के लिए जाना जाता है लेकिन शौरी के अनुसार इंदिरा गाँधी के दबाव के कारण ही उन्हें संपादक के पद से 1982 में हटा दिया गया था।
इंडियन एक्सप्रेस में उनकी एक फिर से वापसी हुई लेकिन 1990 में एक्सप्रेस के इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के एडिटर इन चीफ़ बी जी वर्गीज़ के साथ मतभेदों के बाद वो एक बार फिर से एक्सप्रेस से बाहर हो गए।
इसके बाद से सक्रिय रूप से फिर से स्वतन्त्र लेखन में सक्रिय हो गए।
अरूण ने कई किताबें लिखीं। 1996 में अरूण की एक किताब आई 'वर्शिपिंग फाल्स गाड' इस किताब में भीमराव अंबेडकर की आलोचना की। इस किताब में अरूण ने लिखा कि जहाँ महात्मा गांधी ने देश के विभिन्न वर्गों को एक करने में भूमिका निभाई वहीं अंबेडकर ने इन्हें तोड़ने का काम किया। अरूण के अनुसार अंबेडकर ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बजाय राष्ट्रवादियों के अंग्रेज़ों का साथ दिया। इस किताब के कारण उनकी काफ़ी आलोचना हुई । हांलाकि इसके बाद उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में जगह मिली। 1998 से लेकर 2004 तक वो सरकार में मंत्री रहे। 2004 के बाद 2010 तक राज्यसभा तक वो राज्यसभा के सदस्य रहे।
2009 में बीजेपी में रहते हुए उन्होंने पार्टी की आलोचना की और पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह को एलिस इन ब्लंडरलैंड में रहने वाला बताया था और पार्टी को कटी पतंग के जैसा बताया था। शौरी ने उस समय राष्ट्रीय स्वयं संघ को ही इस क़ाबिल बताया था जो भाजपा को सुधार सके।
संप्रग शासन के दौरान हुए 2G घोटाले की जाँच भी उन तक पंहुची हांलांकि सीबीआई ने उन्हें इस मामले में बाद में क्लीन चिट दे दी।
2014 में भाजपा सरकार के आने की संभावनाएँ थी कि उन्हें मंत्री बनाया जा सकता हैं लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद शौरी मोदी सरकार के सबसे बड़े आलोचक बनकर उभरे। उन्होंने मोदी सरकार में देश में असहिष्णुता बढ़ने का आरोप लगाया। इसके बाद उन पर सरकार में मंत्री पद न मिलने के कारण सरकार की आलोचना करने का आरोप लगा।
वरिष्ठ पत्रकार मधु किश्वर ने उन पर असहिष्णुता के मामले में दोहरा रवैया रखने का आरोप लगाया। मधु ने ट्विटर पर लिखा कि सिख दंगों के समय में जब मैंने उनसे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने को कहा तो उन्होंने ये कहकर मना कर दिया कि सिखों को वास्तव में पाठ पढ़ने की ज़रूरत है।
आज जब फिर से एक बार शौरी मोदी के ख़िलाफ़ मुखर हैं तो बेशक इसे शौरी के उसी स्वभाव का एक हिस्सा माना जा सकता है जिसके तहत उन्होंने सत्ता के प्रतिष्ठान में बैठे बहुत से लोगों की आलोचना की लेकिन जिनके साथ वो खड़े हैं वो शौरी के साथ को किस तरह से देखते है।
शौरी जहाँ अंबेडकर विरोंधी रहे हैं वंही प्रणय राय और उनके चैनल ने अंबेडकर की सोच का आगे बढ़कर समर्थन किया है। उनके वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के विचार ख़ासकर इस मामले और भी कई मामलों में अरूण से अलग हैं।
प्रणय की बहन अरुंधति राय ने भी गांधी की आलोचना करते हुए अंबेडकर को महान बताया था। शौरी के अब तक के जीवन में वो किसी एक व्यक्ति,पार्टी या संगठन के समर्थक बनकर नहीं रहे। देखने वाली बात होगी एनडीटीवी शौरी को इस मामले से आगे बढ़ाकर कहाँ तक ले जाएगी या हमेशा की तरह इस बार भी शौरी की बुद्धिजीविता का उपयोग करके उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाएगा।

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