पूरी दुनिया में मेधा पाटकर ही हैं जो चाहें जितना अनशन कर लें उनके शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा? जानिए क्या है सच

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Nishant Trivedi Mon, 08/07/2017 - 01:00 Medha Patkar

सरदार सरोवर बाँध से डूबे क्षेत्रों के उचित पुर्नवास को लेकर अनशन पर बैठी मेधा पाटकर का अनशन पर आज 11वां दिन था। उनकी हालत खराब भी हो चुकी है। डॉक्टरों के अनुसार उन्हें तत्काल इलाज की आवश्यक्ता है लेकिन मेधा इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। दरअसल सरदार सरोवर बांध से करीब 192 गांव डूब चुके हैं जिससे करीब 40 हजार परिवार प्रभावित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस बाबत सरकार को आदेश दिया था कि 31 जुलाई से पहले सरकार सभी परिवारों का पुनर्वास करवा दे लेकिन सरकार भी ढर्रे पर अडिग रही और तय समय सीमा खत्म हो जाने के बावजूद सारे काम अधूरे पड़े रहे। ऐसे में मेधा ने कमर कसी और अपने 11 अन्य साथियों के साथ अनशन पर बैठ गईं।
मेधा पाटकर के अब तक जीवन को अगर देखें तो वो नर्मदा घाटी के साथ ही शुरू और खत्म होती दिखाई पड़ता है। मेधा पाटकर की रूचि शुरूआत से ही सामाजिक कार्यों में रही है। उन्होंने मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस से 1976 में समाजसेवा में उन्होंने मास्टर डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने कुछ स्वंय सेवी संस्थाओं के साथ जुड़कर समाजसेवा का काम किया और टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस में पढ़ाने का काम भी किया। उन्होंने शादी भी की लेकिन ज्यादा दिनों तक उनकी ये शादी टिक नहीं सकी।
मेधा हमेशा साधारण कपड़ों में रहती हैं लेकिन फर्रादेदार अंग्रेजी बोलना जानती हैं। वो एक बार मुंबई छोड़कर नर्मदा घाटी क्या आईं बिल्कुल यहीं की होकर रह गईं। महाराष्ट्र , गुजरात और मध्य प्रदेश की सरकारों से ही नहीं उन्होंने विश्व बैंक के विरूद्ध भी आवाज बुलंद की है।
दरअसल 1979 में सरदार सरोवर योजना आई। सरकार को लगा कि नर्मदा में कई बांध बना देने से क्षेत्र का विकास होगा लेकिन और उसने बांध बनाने की अनुमति दे दी लेकिन बांध इस प्रक्रिया में कई पहलुओं को बिल्कुल नजरअंदाज किया जा रहा था। मेधा ने अपनी टीम के साथ क्षेत्र का दौरा किया और पता किया कि परियोजना में पर्यावरण के कई मानकों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने इस बात को पर्यावरण मंत्रालय तक पंहुचाया और योजना रूक गई।
1986 में संघर्ष की शुरूआत फिर से हुई जब विश्व बैंक नें परियोजना के लिए धन मुहैया करवाने की घोषणा की। ऐसे में मेधा ने लोगों को संगठित किया और मध्य प्रदेश के सरदार सरोवर बांध तक 36 दिनों तक लंबी यात्रा की। इस दौरान उनके आंदोलन को पुलिस बल के जरिए दबाने की कोशिश की गई। उन्होंने 7 सालों तक लगातार सरकारी अधिकारियों से लेकर विधायकों और सांसदों के आवासों तक धरने प्रदर्शन किए फलस्वरूप विश्व बैंक को पीछे हटना पड़ा और उसने अपनी योजना को वहीं पर रोक दिया। 1985 के बाद से वो लगातार नर्मदा घाटी से जुड़े हर आंदोलन से जुड़ी रही हैं। 1991 में उन्होंने 22 दिनों का लंबा अनशन किया था जिससे उनकी हालत बिगड़ गई थी। 1993 और 1994 में भी उन्होंने लंबे उपवास किए हैं। 2006 में भी जब नर्मदा घाटी पर बने बांध की उंचाईं बढ़ाने का निर्णय किया गया गई तो भी उन्होंने अनशन किया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट से उन्हें इस मामले में झटका भी मिला जब कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद गुजरात सरकार और मध्य प्रदेश की सरकारों ने विदेशियों के साथ मिलकर विकास कार्यों में रोक लगाने का आरोप लगाते हुए उन पर राजद्रोह का मुकदमा भी दर्द करवाया।
हाल फिलहाल मध्य प्रदेश में एक तरफ जहां उनका आंदोलन चरम पर है वहीं दूसरी तरफ व्हाट्स एप के ग्रुपों के जरिए उनके खिलाफ कई अफवाहें उड़ाई जा रही हैं। मध्य प्रदेश की एमपी ब्रेकिंग नाम की वेबसाइट के अनुसार शिवराज के सिपाही नाम के एक व्हाट्स एप ग्रुप के जरिए कुछ इस तरह की बातें फैलाई गई हैं –

1.दिग्विजय और मेधा पुराने साथी हैं और एक दूसरे की मदद करते रहते हैं।

2.पूरी दुनिया में मेधा पाटकर ही हैं जो चाहें जितना अनशन कर लें उनके शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

  1. ये बातें इन लोगों को आईएस रंजीत कुमार की किताब से पता चली हैं।

मेधा पाटकर ने अबतक के जीवन में सिर्फ आंदोलनों में ही सक्रिय रही हैं। उन्होंने सक्रिय राजनीति में कभी भी भाग नहीं लिया। आम आदमी पार्टी में भी वो शामिल रही लेकिन जल्द ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

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