क्या भारतीय समाज अफवाहों पर विश्वास करने वाले भीड़तंत्र में बदल रहा है?

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shashank trivedi Wed, 06/14/2017 - 01:00 Mob lynching, Mob Justice

भीड़ का न्याय सबसे ख़तरनाक होता है। वो कुछ भी हो सकता है। एक उन्माद से भरी भीड़ कुछ भी कर सकती है। भीड़ के न्याय से पीड़ित होने वाला व्यक्ति किसी मामले में दोषी या निर्दोष कोई भी हो सकता है। दोनों ही स्थितियों में भीड़ द्वारा मारा जाना समाज और तंत्र दोनों की ही असफलता का परिणाम है।

पिछले कुछ समय में भीड़ द्वारा न्याय करने की कुछ घटनाएँ हुईं। इन सब घटनाओं में बड़े ही जघन्य तरीके से लोगों को मारा गया। सभी घटनाओं पर लोगों ने अपनी अपनी प्रतिक्रिया दी। मैनें देखा कि तमाम बुद्धिजीवियों को इन सब में एक चीज़ समान लगी और वो थी सांप्रदायिकता। वो हो सकती है। दूसरे पक्षों ने सबमें अलग अलग तरीके के तर्क दिए कि वो सांप्रदायिकता नहीं थी और अगर थी भी तो वो किस तरह से जायज़ थी।
मुझे भी इन सब में कुछ चीज़ें समान लगीं जिन्हें मैं अलग अलग बिंदुओं के ज़रिए आपके सामने स्पष्ट कर रहा हूँ-
अशिक्षा- बेशक पाठको को ये लग सकता है कि ये तो साधारण कारण है कोई भी इसे बता सकता है लेकिन सवाल यहीं से पैदा होता है। दादरी में भीड़ द्वारा हिंसा में मरे गए अख़लाक़ की हत्या को साम्प्रदायिकता से जोड़ा गया, लेकिन मुझे सांप्रदायिकता समाज की अन्य हक़ीक़तों पर पर्दा डालने का एक तरीक़ा भर मालूम होता है। मैं मान सकता हूँ कि जिस व्यक्ति ने वहाँ ख़बर फैलाई उसका मक़सद गलत हो सकता है लेकिन जो 2500 लोगों की भीड़ वहाँ इकठ्ठा हो गई उनमें से हर एक तो भाजपा या संघ का एजेंट नहीं था। आख़िर वो लोग क्यों एक एलान भर से इकठ्ठा होकर आ गए और उन्होंने एक शख़्स की जान ले ली। उन्होंने क्यों उन तथ्यों की पड़ताल करने की कोशिश क्यों नहीं कि जो माइक से कहे गए थे। लोगों ने सुना और सुनते ही किसी की जान ले ली।
बेशक हम पूरी भीड़ को सांप्रदायिक बताकर अपनी सच्चाई ये है कि उन लोगों में इतनी जागरूकता ही नहीं थी कि वो किसी को सज़ा देने से पहले पड़ताल करें। अगर संघ और भाजपा से उन्हें पावर मिल रहा था तो क्यों वो इसमें फँस रहे थे। इसका कारण था कि वो अशिक्षित थे वो जागरूक नहीं थे जिसके कारण उन्होंने वो किया जो बेहद गलत था। पूरी भीड़ को सांप्रदायिक और भक्त कहकर हम पल्ला नहीं झाड़ सकते ये मामला उससे ऊपर का है और हमें उसकी तह में जाने की ज़रूरत है।
अगर बुद्धिजीवियों के अनुसार ये सब सांप्रदायिकता का नतीजा है तो मेरा उनसे सवाल है कि क्या सांप्रदायिकता भी भला विकसित समाज की निशानी है। अगर नहीं है तो आप सांप्रदायिकता पर अटककर क्यों रह जाते हैं आप उसके नीचे क्यों नहीं जाते। वैसे तो ये ज़िम्मेदारी सरकार की है लेकिन अगर आपको लगता है कि सरकार ख़ुद सांप्रदायिकता फैलाने में लिप्त है तो आप की ज़िम्मेदारी और ज़्यादा बढ़ जाती है और वो समाज को सांप्रदायिक और कुंठित बता देने भर से पूरी नहीं होगी। उसके लिए ज़रूरी है कि समाज को शिक्षित किया जाए और इस योग्य बनाया जाए कि वो अफ़वाहों पर ध्यान देना ही बंद कर दे। उन जगहों पर जहाँ ये घटनाएँ हुई हैं वहाँ पूरे क्षेत्रों सर्वें कराया जाना चाहिए कि वहाँ पर सामाजिक पिछड़ेपन और रोज़गार की स्थिति क्या है।
उन क्षेत्रों में की स्थिति का पता करने के बाद अगर निश्चित तौर पर वहाँ इन मामलों में काम किया जाए तो वहाँ से सांप्रदायिक ख़त्म हो जाएगी।
न्याय मिलने में देरी - लंबी क़ानूनी प्रक्रिया और तमाम अड़चनों की वजह से आज अदालतों से न्याय मिलने में बहुत लंबा वक़्त लगता है। धन की लागत वो अलग से ऊपर से हमारे न्यायालय भी अन्य मामलों को तो छोड़िए जिनमें वो मिसाल दे सकते हैं उनमें भी देरी करते हैं। निर्भया कांड के बाद जल्द से जल्द न्यायिक प्रक्रिया पूरी करके दोषियों को सज़ा दी जानी चाहिए थी। दूसरी तरफ़ इसी न्याय प्रक्रिया के कारण उस मामले में एक आरोपी बच भी गया।
इन सबसे लोगों में न्याय को लेकर संभावनाओं पर चोट लगी है। वो निराश हैं उन्हें लगता है कि न्याय जब मिलेगा नहीं या देर से मिलेगा तो क्यों न तुरंत ही न्याय किया जाए। इस तरह से एक न्यायिक रूप से कुंठित समाज का निर्माण हमारे देश में हो चुका है जिसका भरोसा अब न्यायिक तंत्र से उठ चुका है। अब वो जब तक शांत रहता है तब तक तो ठीक है लेकिन जैसे ही वो कहीं से ज़रा सा आँच पाता है उबाल मार देता है। हमें ज़रूरत है न्याय के प्रति भरोसा जगाने की ताकि हमताकि हम समय समय पर होने वाली अप्रिय घटनाओं से बच सकें। ज़रूरी है कि जब हमारे समाज में भीड़ के द्वारा इस तरह की घटनाएँ की जाएँ हों तो हम सांप्रदायिकता का रोना बंद करके प्रोपगंडा न फैलाएँ और कुछ ज़मीनी सच्चाई से अवगत होकर स्थिति को ठीक करने का प्रयास करें।

(This article written by Shashank Trivedi . The views expressed are personal. He can be reached at s.shashanktrivedi@gmail.com)

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