घोर लापरवाहियों का परिणाम है मुजफ्फरनगर रेल हादसा

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Nishant Trivedi Sun, 08/20/2017 - 00:00 Rail Accident, Kalinga-Utkal Express

रेल को यातायात के साधनों में सड़क की अपेक्षा सुरक्षित और आरामदायक साधन माना जाता है लेकिन समय-समय पर होने वाली दुर्घटनाएं इस धारणा पर सवाल खड़े करती हैं। कल शाम को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक रेल दुर्घटना हुई जिसमें करीब 24 लोगों ने अपनी जान गवां दी। जब ट्रेन की बोगियां एक दूसरे के ऊपर चढ़ने से लेकर पास के मकानों तक पर जाकर तक गिर जाए तो ये अंदाजा लगाना मुश्किल है कि कितने लोग घायल हुए होंगें।
घटनास्थल से कई दर्दनाक तस्वीरें हमारे सामने आ रही हैं। इन सबके बीच घटना के तुरंत बाद इसे आतंकवादी साजिश करार देने की कोशिश हुई। शायद ये कदम सरकार की और से अपनी लापरवाही पर पर्दा डालने का एक प्रयास था। बाद में जो तस्वीर सामने आई है उसके अनुसार दरअसल ट्रेन के ड्राइवर को ये मालूम ही नहीं था कि ट्रैक पर मरम्मत का काम चल रहा है। जब वो मौके पर पंहुचा तो उसने वहीं पर एमरजेंसी ब्रेक लगाए जिससे करीब 14 बोगियां एक दूसरे के ऊपर पलट गईं। जिस मकान पर ट्रेन की एक बोगी गिरी है उसके मालिक के अनुसार उसने 1 महीने पहले ही रेलवे के अधिकारियों को ट्रैक के टूटे होने के बारे में जानकारी दी थी लेकिन उसके बावजूद रेलवे नहीं चेता। ये पूरी कहानी दिखाती है कि रेलवे न सिर्फ अपनी जिम्मेदारियों को लेकर गंभीर नहीं है बल्कि वो खुद की गलतियों को छिपाने का प्रयास भी करता है। इस परिदृश्य में एक बात और सामने आती है कि कहीं न कहीं रेल मंत्रालय अपने अधिकारियों को बार बार होने वाली दुर्घटनाओं के बावजूद लापरवाही न बरतने का सख्त संदेश नहीं दे पा रहा है।
रेल मंत्री के तौर सुरेश प्रभु दुर्घटना के तुरंत बाद तो एक्शन में आते हैं लेकिन कुछ दिन बीत जाने के बाद वो भी यात्री सुरक्षा के बजाय अन्य आधुनिक सुविधाओं से रेलवे को लैस करने के बारे में ज्यादा गंभीर दिखाई पड़ते हैं। इतनी दुर्घटनाओं के बावजूद आज तक सुरेश ने कभी भी रेलवे को दुर्घटनाओं से बचाने का कोई पुख्ता प्लान पेश नहीं किया है। ऐसा लगता है कि एक दुर्घटना के बाद वो सो से जाते हैं और जब दूसरी दुर्घटना होती है तब वो फिर से जागते हैं इधर उधर हाथ पैर भी मारते हैं लेकिन आखिर में फिर से शांति से बैठ जाते हैं।
 वर्तमान केन्द्र सरकार ने रेलवे को हमेशा ही अपने एजेंडे में ऊपर रखने की बात कही है।अपनी पार्टी में योग्य व्यक्ति न होने पर  शिवसेना से इस्तीफा दिलाकर सुरश प्रभु को रेल मंत्रालय में लाया गया। रेलवे को घाटे से उबारने की बात की गई। सुविधाओं को और बेहतर करने की बात की गई। जब बात सुविधाओं की आती है तो सुरक्षा स्वयं उसमें शामिल हो जाती है। अगर अन्य सुविधाओं के बारे में भी बात करे तो आज भी एसी और ज्यादा किराए वाली ट्रेनों की ही सुविधाए अच्छी हुई हैं बाकि गरीबों को आज भी ट्रेन के शौचालयों तक में सफर करना होता है। ऐसे में रेल मंत्रालय किन प्राथमिकतों पर चल रहा है ये एक सवाल है।
आज के समय में जब हम देश में बुलेट ट्रेन चलाने की बात करते हैं और दूसरी तरफ मुजफ्फरनगर जैसे हादसे होते हैं। निश्चित तौर पर हर एक आम नागरिक के  मन में सवाल पैदा होता है कि क्या हमारे देश में रेल की पटरियाँ और रेलवे तंत्र इतना मजबूत हो गया है कि हम बुलेट ट्रेन को सुरक्षित दौड़ा सकें।
अगर कुछ समय पहले दुर्घटनाग्रस्त हुई इंदौर-पटना एक्सप्रेस की बात की जाए तो समाचारों में  आए यात्रियों के अनुभव के अनुसार झांसी के बाद से ही ट्रेन में आवाजें आ रही थीं। ट्रेन ड्राइवर जलत शर्मा  की रिपोर्ट के अनुसार ट्रेन में तेज आवाजें आने की सूचना अधिकारियों को दे दी गई थी लेकिन सूचना के बावजूद ट्रेन को कानपुर तक वैसे ही लाने का आदेश दिया गया । ये घटनाक्रम  दिखाता है कि रेलवे जैसे महत्वपूर्ण विभाग में किस तरह के लापरवाह अधिकारियों का समूह है। इस तरह के हादसे पिछली सरकारों के समय में होते थे और अभी भी हो रहे  है जो दिखाता है कि अधिकारियों की मानसिकता में परिवर्तन नहीं हो पा रहा है वे उसी तरह के रवैये के साथ काम कर रहे।
इस पूरे हादसे की जाँच के आदेश दिए गए हैं । निश्चित तौर पर जाँच होगी कारण भी सामने आएंगे लेकिन रेलवे इस जाँच परिणाम से क्या सीखेगा ये कहना  मुश्किल है क्योंकि अभी तक की जाँचों में लगभग एक तरीके के परिणाम सामने आते रहते हैं फिर भी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहती है।
प्रधानमंत्री,रेलमंत्री ने घटना पर दुख जताते हुए जाँच में दोषी पाए जाने वाले लोगों पर सख्त कार्रवार्ई की बात का है। सरकार की ओर  से मुआवजे की घोषणा भी की गई। ये मुआवजा उन तमाम लोगों के जख्में पर मरहम नहीं लगा सकता जिन्होंने उस घटना में अपने परिजनों को खोया है।
इस मुआवजे से ज्यादा जरूरत आज रेलवे के सुरक्षा तंत्र के मजबूत करने का है ताकि पुखरायां जैसा हादसा दोबारा न हो और तमाम लोगों को अपनी जानें न गंवानी पड़े।

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