पद्मावती: एक फिल्म की बात नहीं ये लोगो की आस्था और कानून व्यवस्था पर चोट है।

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Nishant Trivedi Tue, 11/28/2017 - 04:21 Padmavati, Rajput

फिल्म पद्मावती पर बीते काफी दिनों से बवाल चल रहा है। फिल्म की शूटिंग जब फरवरी में जयपुर में हो रही थी तभी फिल्म के सेट पर करणी सेना नाम के एक संगठन के एक संगठन ने तोड़फोड़ की। कुछ दिनों बाद फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली के साथ भी मारपीट की गई।

जो लोग इस फिल्म का विरोद कर रहे हैं उनका कहना है कि फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती के बीच अंतरंग दृश्य दिखाए गए हैं। करणी सेना का मानना है कि ये इतिहास के साथ पूरी तरह से तोड़फोड़ करने वाला है। दरअसल एतिहासिक तथ्यों के हिसाब से पद्मावती ने अलाउद्दीन के पास जाने से बचने के लिए 16 हजार अन्य रानियों के साथ आग में कूदकर जौहर को अंजमा दिया था।

इस पूरे मामले में दो पक्ष हैं जिन पर गंभीरता के साथ गौर किया जाना चाहिए। पहली बात ये है कि करणी सेना की तरफ से लगातार हिंसा की धमकी दी जा रही है। थियेटर जला देगें। दीपिका पादुकोंण को नाक काटने की धमकी दी गई। इस बात में कोई शक नहीं कि ये लोग सिर्फ बातें करते हैं और मीडिया में चर्चा पाने से ज्यादा इनका कोई और लक्ष्य नहीं होता है लेकिन फिर भी सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे लोगों पर कड़ी कारवाई की जाए ताकि विरोध के तरीके का अहिंसात्मक रूप बरकरार रखा जा सके।

दूसरा पक्ष फिल्म से जुड़ा हुआ है। फिल्म में अगर वाकई अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती के वाकई अगर कुछ अंतरंग दृश्य दिखाए गए हैं तो वो आपत्तिजनक है। भले ही इतिहासकारों के एक पक्ष से लेकर बहुत से लोग पद्मावती के अस्तित्व और उस समय के एतिहासिक घटनाक्रम पर सवाल खड़े करें लेकिन राजपूत से लेकर तमाम भारतीय समाज में पद्मावती को लेकर एक आस्था जुड़ी हुई है। अगर वाकई फिल्म में कुछ ऐसा दिखाया जाता है जो उस आस्था के एकदम विपरीत है तो ये वाकई बेहद अफसोसजनक है।

बेशक इसके लिए स्वतंत्र रचनात्मकता की दुहाई दी जा सकती है लेकिन रचनाकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसकी रचनात्मकता किसी की आस्था पर चोट न करे। अगर वाकई आप किसी भी तरह कि फिल्म बनाना चाहते हैं तो उसके लिए एतिहासिक चरित्रों को ही इस्तेमाल कर उन पर अपनी कथित रचनात्मकता को थोपने का क्या मतलब है। आप जिस तरह की फिल्म बनाना चाहते हैं वो बनाइए। कहानी के हिसाब से बनाइए लेकिन बेवजह फिल्म की मार्केटिंग के लिए एतिहासिक चरित्रों का इस्तेमाल न करें।

बाहुबली रचनात्मक स्वतंत्रता का एक अच्छा उदाहारण है। फिल्मकार ने बगैर किसी एतिहासिक पृष्ठभूमि का उपयोग किए बिना एक भव्य फिल्म बनाई है। जिसकी कहानी हमें प्राचीन काल की याद दिलाती है कि पुराने समय में किस तरह से संघर्ष होते थे। अगर फिल्म में किन्ही ऐसे चरित्रों पर दिखाया जाता जिन्हें भारतीय समाज अपना वास्तविक आदर्श मानता है तो शायद कटप्पा के बाहुबली को तलवार घोंपने पर जनता का मन उद्वेलित हो जाता है लेकिन फिल्मकार ने फिल्म के मूल चरित्र पर ज्यादा मेहनत की न कि उसकी पब्लिसिटी के लिए और एक एतिहासिक का निर्माण किया है।

इसलिए बेहतर होगा कि जो लोग हिंसा कि धमकी दे रहे हैं उन्हें सबक सिखाया जाए लेकिन फिल्मकार को भी इस संवैधानिक दायरे में इस बात का आभास करवाया जाए जो उन्होंने किया है या वो करने वाले हैं ये कोई अच्छी बात नहीं है और फिल्म के इस तरह से फर्जी प्रमोशन से बाज आया जाए। मूल सिनेमा पर ध्यान देते हुए कुछ अच्छी फिल्में बनाएं।

( बाहुबली का वर्णन पद्मावती के साथ तुलना को ध्यान में रखते हुए किया गया है जिस श्रेणी की फिल्म संजय लीला भंसाली ने बनाई है उस श्रेणी में बाहुबली को एतिहासिक और भव्य बताया गया है। इसका मतलब ये कतई नहीं है कि नॉन कमर्शियल तरह की बनने वाली फिल्में शानदार नहीं हैं उनका अपना महात्व है।)

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