ईरान में राष्ट्रपति पद के लिए दोबारा चुने गए हसन रूहानी का अब तक का सफर

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Nishant Trivedi Tue, 05/23/2017 - 01:53 Iran, Hasan Rouhani, Irani President

ईरान में हाल ही में संपन्न हुए राष्ट्रपति चुनावों में उदारवादी नेता हसन रूहानी ने जीत हासिल की है। कट्टरपंथी नेता मोहम्मद अहमदीनेज़ाद के 10 साल के शासन के बाद सत्ता संभालने वाले हसन रूहानी ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ संबंध सुधारने के काफ़ी प्रयास किए हैं। रूहानी के अब तक सफ़र पर एक नज़र डालते हैं।
व्यक्तिगत जीवन –

रूहानी का जन्म 1948 में एक किसान परिवार में हुआ था। रूहानी के पिता एक बुनकर थे। रूहानी के पिता के संबंध कई मौलवियों से थे जिनके कारण रूहानी का ध्यान भी उस तरफ़ काफ़ी था।
रूहानी नें एक वक़ील, डिप्लोमेट, एकेडमीशियन के तौर पर काम किया है। वो एक इस्लामिक विद्वान भी हैं। अपने जीवन में उन्होंनें ईरान ने कई बड़े सरकारी पदों पर काम किया जिनमेँ 4, 5वें कार्यकाल के लिए संसद का डिप्टी स्पीकर होना भी शामिल है।
हसन की शादी अपने से 6 साल छोटी अपनी कज़िन से 20 साल की उम्र में हुई थी। हसन कुल 5 बच्चों के पिता हैं। उनके एक बेटे की मौत रहस्यमय तरीके से हो गई थी। सऊदी अरब के एक अख़बार की मानें तो उनके बेटे ने खामनेई से संबंधों के कारण आत्महत्या कर ली थी।
द गार्जियन के मुताबिक़ हसन रूहानी, ईरान के सर्वोच्च नेता खामनेई की पसंद कभी भी नहीं थे लेकिन परमाणु कार्यक्रम में बग़ैर किसी परिवर्तन के अमेरिका के साथ संबंध ठीक करने की बात करने के कारण रूहानी को उनका समर्थन मिला।
रूहानी की छवि अपने देश में एक सुधारवादी नेता की है। वो हर व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात पर अमल करते हैं। वो महिलाओं के अधिकारों के लिए भी बात करते रहे हैं।
अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ संबंध -
जब रूहानी राष्ट्रपति बने तो ईरान के ऊपर बहुत से प्रतिबंध लगे थे। उन्होंने जनता से वादा किया था कि वो बग़ैर परमाणु कार्यक्रम को रोके दुनिया भर से ईरान के अलग थलग होने के हालात को ख़त्म करेगें।

इससे पहले रुहानी 2003 में भी चर्चा में आये थे जब एक भूकंप प्रभावित क्षेत्र का उन्होंनें दौरा किया था और वहां उपलब्ध करवाई गई चिकित्सीय सहायता के लिए अमेरिका को धन्यवाद दिया था।

2015 में अमेरिकी और पश्निची देशों के साथ उन्हीं के नेतृत्व में एक एतिहासिक समझौता भी हुआ था जिसके तहत ईरान के ऊपर लगे तमाम प्रतिबंधों को हटा दिया गया था जिसके बदले में ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम की निगरानी करवानी थी। रुहानी ने इसे एतिहासिक बताते हुए सर्वोच्च धार्मिक नेता को धन्यवाद भी दिया था। इस समझौते के समय अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा थे। हाल के समय में अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद ट्रंप ने जिस तरह ओबामा की कई नीतियों को जिस तरह से पलटने की बात कही है और ईरान के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाया है ये देखना दिलचस्प होगा कि उदारवादी रुहानी इससे किस तरह से निपटते हैं।

रूहानी का भारत के साथ रिश्ता-

रूहानी के पहले कार्यकाल के दौरान चाबहार बंदरगाह के विकास करने को लेकर दोनों देशों के मध्य एक समझौता हुआ था।
दरअसल चाबहार बंदरगाह ईरान के दक्षिणी तट और सिस्तान - बलूचिस्तान प्रांत में पड़ता है और भारत के पश्चिमी तट से फ़ारस की खाड़ी तक पहुँचना आसान हो जाएगा।
इससे भारत को अफ़ग़ानिस्तान तक सामान पंहुचाने के लिए सीधा रास्ता मिलेगा। अभी तक ये रास्ता पाकिस्तान से होकर तय करना पड़ता था।
इसलिए चाबहार के ज़रिए न सिर्फ व्यापार बल्कि आतंकवाद और कई अन्य कई क्षेत्रों में भारत अफ़ग़ानिस्तान ईरान धुरी का निर्माण होगा जो पाकिस्तान को भारतीय उपमहाद्वीप में अलग थलग कर देगा।
इससे पहले भी कई मौक़ों पर पाकिस्तान और ईरान के संबंधों में तनातनी देखने को मिली है। दूसरी तरफ़ रूहानी के रहते हुए भारत ईरान के गैस पाइपलाइन समझौता होने की संभावनाओं को बल मिला।
इन परिस्थितिओं को देंखते हुए हम कह सकते है कि रूहानी का ईरान का दोबारा राष्ट्रपति बनना भारत के हित में हो सकता है।

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