भारतीय समाज और समय के साथ दहेज़ का बदलता स्वरुप

Fri, 06/09/2017 - 23:41

दहेज प्रथा : महिलाओं के शोषण का एक प्रतीक दहेज प्रथा भारत की उन समाजिक कुरीतियों में से एक है जो आज भी बदस्तूर जारी है । दहेज प्रथा की शुरूआत भारत में ब्रिटिश शासनकाल के पहले हुई थी । ये प्रथा उस समय दरअसल एक कुरीति के रूप में नहीं थी । उस समय पिता विवाह के समय पुत्री को उपहार स्वरूप कुछ धन या भूमि दान में देता था । इस भूमि या धन पर सिर्फ उसकी पुत्री का हक होता था । इस संपदा के जरिए वो महिला स्वावलंबी भी होती थी और परिवार का भरण-पोषण भी करती थी ।

वीना तलवार ओल्डेनबर्ग की किताब “डोवरी मर्डर द इंपीरियल ओरिजिंस ऑफ कल्चरल क्राइम्स” के अनुसार ब्रिटिश शासनकाल के दौरान महिलाओं के संपत्ति रखने के अधिकार के अधिकार के खत्म कर दिया गया । इसके बाद पिता द्वारा दिया गए धन पर बजाय पुत्री के उसके दामाद का हक होने लगा । शायद वो समय था दहेज प्रथा को फिर से परिभाषित और समझने का लेकिन समाज उस समय ये करने में असफल रहा और एक परंपरा के रूप में इसे आगे बढाए रखा गया । इस सबका नतीजा आज हमारे सामने है ।

इसके बाद एक महिला को विवाह के समय सिर्फ एक कमाई के जरिए के रूप में देखा जाने लगा । विवाह एक व्यापारिक समझौते में तब्दील हो गया । 1956 में आने वाला हिंदू विवाह अधिनियम एक जरूर ऐसा कानून था पुत्रियों को भी अपने पिता की संपत्ति पर हक देने की बात करता था लेकिन तब तक परिस्थितियाँ बदल चुकी थी और एक कुरीति जन्म ले चुकी थी । अब अगर वर्तमान स्थिति की बात करें तो इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार 2012 ,2013 ,2014 में कुल 24,771 दहेज संबंधी मौते देश में हुई हैं । 8,233, 8,083, and 8,455 ये वो कुल केस हैं जो भारत में दहेज प्रताड़ना के मामलों में रजिस्टर किए गए ।

उत्तर प्रदेश 7048 मौतों के साथ इस मामले में पहले पायदान पर है जबकि बिहार और मध्य प्रदेश 3820 और 2252 मौतों के दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं । आँक़ड़े ये दर्शाते हैं कि उत्तर भारत इस समस्या से ज्यादा ही पीड़ीत है । वास्तविकता में दहेज प्रथा उन महिलाओं के लिए हानिकारक रही ही है जो इसका शिकार होकर मृत्यु के प्राप्त हुई बल्कि उनके लिए भी है जो जीवित हैं लेकिन उन्हें खुद के जीवन से संबधित फैसले लेने का अधिकार तक नहीं होता । दहेज का अभी तक का स्वरूप कहीं न कहीं समाज की न भ्रांतियों का परिणाम मालूम पड़ता है जिनमें विवाह को बहुत ज्यादा मान्यता दी गई है ।

खासकर आज भी समाज में इस महिला या पुरूष को हीन दृष्टि से देखा जाता है जिसका विवाह नहीं होता । विवाह की सामाजिक अनिवार्यता समाज में बहुत सारी समस्याओं को जन्म देती है जिनमें दहेज प्रथा एक है । ये बात भारतीय माता पिताओं के मन में बैठी हुई है कि पुत्री का विवाह ही उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है । वो इसके लिए पुत्री के बचपन से ही तैयारियाँ प्रारंभ कर देते हैं । वो ये नहीं सोचते कि पुत्री को शिक्षा दिला देने से और उसे स्वावलंबी बना देने से उसका कल्याण होगा । अगर पुत्री अपने पैरों पर खड़ी होगी तो वो ज्यादा मजबूती के साथ उसके लिए वर का चयन कर सकते हैं । अपने पूरे जीवन के फैसले लेने की ताकत भी उनकी पुत्री की खुद की होगी लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं होता ।अधिकतर मामलों में माता पिता पूरे जीवन पुत्री की शादी करने की सोच में पड़े में रहते हैं । फिर परंपरयें ऊपर हैं तो दहेज देना भी है और नतीजा ये होता है कि पुत्री को जिंदगी भर के लिए किसी अंजान पुरूष के हाथों में सौंपकर वो खुद को निवृत्त मान लेते हैं ।
अब सवाल एक और खड़ा होता है कि क्या जो स्वालंबी नहीं उसे जीवन के फैसले लेने का हक नहीं है ? बिल्कुल है लेकिन बात फिर से आती है स्वावलंबी होने की । आज के दौर में हम आर्थिक महात्व को नकार नहीं सकते । पुत्री या पत्नी के पास न तो जमीन है और न ही इतनी शिक्षा दिक्षा है कि वो खुद कुछ जीविका उत्पन्न कर सके । माता पिता पहले से ही सब कुछ दे चुके हैं । ऐसे में महिला के सामने वही स्थिति होती है जो हो रहा है उसे बर्दाशत करे और शांति से रहे और इन सबके बीच परिवार न टूटे जैसे अन्य सामाजिक दबाब भी उसी महिला को झेलने पड़ते हैं ।

भारतीय पढे लिखे और विकसित समाज की तरफ अगर हम देखें तो पाएगें कि उसने किस तरह से दहेज के स्वरूप के बदल दिया है । अब इस समाज के पुरूष उन्हीं महिलाओं से विवाह करते हैं जो किसी नौकरी में हैं । उनकी विवाह की माँग यही होती है कि महिला नौकरी करती हुई हो । ये परिस्थिति भी इस तरह से हम देख सकते हैं कि सामाजिक रूप से अनिवार्य विवाह और दहेज प्रथा ने किस तरह से महिलाओं की दशा को प्रभावित करके विवाह को मात्र एक व्यापारिक समझौते में तब्दील करके रख दीया गया है । सरकार ने 1962 में एक कानून बनाया जिसमें दहेज निरोधी कानून का नाम दिया गया । इस कानून के अनुसार दहेज लेना और दहेज देना दोनों ही कानूनन जुर्म है । दहेज के लेन देन पर ही 5 सालों की कैद और 15,000 रूपये जुर्माने का प्रावधान है । दहेज की माँग करना भी दंडनीय है, इसके लिए 6 माह से लेकर 2 साल तक की सजा हो सकती है। इसके अतिरिक्त 10,000 `रूपये का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। अब सवाल इस बात का है कि आखिर क्यों इन कानूनों के बाद भी दहेज प्रथा बंद क्यों नही हो रही है । इसका प्रमुख कारण है कि जिस एक सामाजिक चेतना का उदय इस समस्या के खिलाफ होना चाहिए वो नहीं हो पा रहा । अधितकर दहेज प्रताड़ना के मामले कभी हत्या या महिला के प्रताड़ित होने के साथ ही सामने आ पाते हैं आखिर क्यों वो तब सामने नहीं आते जब दहेज की माँग की जाती है । अगर वहीं से लोग अपने अधिकारों का इस्तेमाल प्रारंभ कर दें एक सामाजिक माहौल बनेगा जो इस समस्या को खत्म करने में मददगार होगा ।

(This Article written by Shashank Trivedi. The views expressed are personal.. Follow him on Twitter @sshashanktrive1 . For feedback mail us at editor@thepeoplepost.com )

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