भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के कार्यकाल का आज आखिरी दिन था.शायद ये कहना गलत नहीं होगा की दीपक मिश्रा सुप्रीम कोर्ट के सबसे चर्चित प्रधान न्यायाधीशों में से रहे.दीपक मिश्रा सुप्रीम कोर्ट के वो पहले प्रधान न्यायाधीश रहे जिनके खिलाफ विपक्ष महाभियोग का प्रस्ताव लेकर आया.जनवरी में 4 जजों ने उनके खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की और गंभीर आरोप लगाए.इन सब विवादों के बीच दीपक मिश्रा ने कई अहम फैसले दिए जो भारत के भविष्य में अहम भूमिका अदा करने वाले हैं.ओडिशा से अपने करियर की शुरूआत करने वाले दीपक मिश्रा का कार्यकाल 13 महीने और 6 दिन का रहा.

दीपक मिश्रा भारत में कथित बुद्धिजीवी समाज के कभी प्रिय नहीं रहे हालांकि उनके कई फैसले जरूर बुद्धिजीवी समाज ने पसंद किेए.जज लोया केस की सुनवाई से लेकर फैसले तक दीपक मिश्रा बुद्धिजीवी समाज की आखों में चुभते रहे और 4 जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस भी उसी केस के इर्द गिर्द घूमती हुई थी.प्रेंस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया गया था की चीफ जस्टिस मास्टर ऑफ रोस्टर के अधिकार का दुरुपयोग कर रहे हैं.केस में फैसला सुनाते वक्त दीपक मिश्रा और उनके सहयोगी जजों ने लोया केस के याचिकाकर्ताओं पर सख्त टिप्पणी की थी.अपनी टिप्पणी में उन्होंने कहा था की ये याचिका राजनीतिक फायदा और न्य़ायपालिका पर सवाल उठाने के लिए दायर की गई है.केस की सुनवाई कर रहे जजों पर हमले किए गए हैं और ये कोर्ट की आपराधिक अवमानना है हालांकि अवमानना की कार्रवाई नहीं की जाएगी.

दीपक मिश्रा की एक छवि बनाई गई.वो छवि बनाई गई की वो केंद्र सरकार के करीबी हैं.केंद्र जैसे फैसले चाहता है वैसे वो फैसले करते हैं.जज लोया केस में मची हायतौबा इसीलिए थी.क्योंकि केस में बीजेपी प्रमुख अमित शाह का नाम आ रहा था.कांग्रेस इस फैसले से इस कदर आहत हुई की उसने चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग लाने का फैसला भी कर लिया.लेकिन उसी फैसले के बाद कर्नाटक में सरकार संकट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र की जीत करार दिया.कुल मिलाकर दीपक मिश्रा का कार्यकाल भारत में एक तबके लिए उतार चढ़ाव भरा रहा हालत ये रही की जब फैसला हक में न आए तो फैसला दीपक मिश्रा का है लेकिन अगर हक में है तो फैसला सुप्रीम कोर्ट का है.उनके कार्य़काल में सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम फैसले दिए जो इस तरह हैं-

1.सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को अंसवैधानिक ठहरा दिया.जिसके बाद भारत में समलैंगिक संबंध बनाना अपराध नहीं रहा.भारत के 'प्रगतिशील' समाज ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की खासी प्रशंसा की.
2.सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने आधार की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा.हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कुछ प्रतिबंध भी लगाए.
3.केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से लेकर 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी थी.सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी खत्म किया.
4.सुप्रीम कोर्ट ने धारा 497 को भी असंवैधानिक ठहराया.इसके बाद भारत में विवाहेतर संबंध अपराध नहीं रहे.ये धारा महिलाओं के प्रति पक्षपाती मानी जाती थी.
5.अयोध्या केस में मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है, के बारे में 1994 के फैसले को दोबारा विचार के लिए संवैधानिक बेंच भेजने से इनकार कर दिया. फैसले के बाद साफ कर दिया गया की अयोध्या केस को भूमि विवाद के आधार पर देखा जाएगा.
6.SC-ST से जुड़े लोगों को सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण का रास्ता साफ कर दिया.इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में बदलाव भी किया था जिसका एससी एसटी समुदाय ने विरोध किया और सरकार ने संसद में कानून लाकर वापस इसे बदल दिया.
7.दहेज प्रताड़ना मामले में पति और उनके परिजनों को तुरंत गिरफ्तारी से मिले सेफगार्ड को खत्म कर दिया.
8.दीपक मिश्रा ने सिनेमाघरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान बजाने को अनिवार्य करने का फैसला किया तो इस फैसले की खासी आलोचना हुई लेकिन बाद में उन्होंने केंद्र सरकार की सलाह पर अपने फैसले को पलटा भी.

तमाम विवादों के बीच दीपक मिश्रा ने एक रिकॉर्ड भी कायम किया.वो रिकॉर्ड जो बैलगाड़ी की तरह चलने वाली भारतीय न्यायव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी था.दरअसल 28 अगस्त 2017 को दीपक मिश्रा के कार्यकाल संभालने के बाद 2 महीने के भीतर सुप्रीम कोर्ट में 9 हजार से ज्यादा केस निपटाए गए.इस दौरान कुल 7021 मामले दर्ज हुए.ये स्थिति पहली बार हुई जब दर्ज मुकदमों से संख्या निपटाए गए मुकदमों से ज्यादा थी.कुल मिलाकर दीपक मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट में अपने कार्यकाल में जमकर 'काम' किया.वो अलग बात है की ये बहुत से लोगों को पसंद नहीं आया.